जल संचय से भूमि क्षरण में आ जाती है कमी

Mirzapur Updated Sat, 11 Aug 2012 12:00 PM IST
मिर्जापुर। बरकछा स्थित राजीव गांधी दक्षिणी परिसर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र पर शुक्रवार से केंद्र पुरोनिधानित परियोजना समन्वित जल समेट विकास कार्यक्रम के तहत झारखंड राज्य से आए हुए प्रगतिशील महिला कृषकों का प्रशिक्षण चल रहा है। सुविख्यात कृषि वैज्ञानिक एवं धान प्रजनक तथा दक्षिणी परिसर के विशेष कार्याधिकारी ओएसडी प्रो. रवि प्रताप सिंह ने झारखंड के कृषकों को जल संचयन एवं उसके विवेक सम्मत उपयोग के बारे में विस्तार पूर्वक प्रशिक्षण दिया।
ओएसडी प्रो. सिंह ने सूखा आधारित क्षेत्र के किसानों को काशी हिंदू विश्वविद्यालय तथा देश के अन्य अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित धान की नवीन प्रजातियों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि मालवीय 105, मालवीय बासमती 4-3, मालवीय सुगंध 2-1, नरेंद्र -97, शुष्क सम्राट तथा सहभागी धान की प्रजातियों का प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि यह सभी प्रजातियां 100-135 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं तथा सिंचाई के अभाव वाली परिस्थितियों में भी पर्याप्त उत्पादन देती हैं। जल तथा भूमि संरक्षण के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि वर्षा जल संचय से एक तरफ जहां खेती समृद्ध होती है, वहीं दूसरी ओर भूमि-क्षरण में भी कमी आती है तथा भूमिगत जलस्तर में बढ़ोतरी दर्ज की जाती है। प्रो. रवि प्रताप सिंह ने दक्षिणी परिसर द्वारा चल रहे जल संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की चर्चा करते हुए बताया कि जबसे हम लोगाें ने पानी रोकना शुरू किया है तबसे वर्ष भर फसल उत्पादन दक्षिणी परिसर में हो रहा है। कृषि अवशेष प्रबंधन पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए प्रो. सिंहने इसके समुचित प्रबंधन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बहुमूल्य कृषि अवशेषों को खेत में ही सड़ाना चाहिए, जबकि इनको जलाने से कार्बनिक पदार्थ तथा पर्यावरण दोनों की क्षति होती है। पानी के समुचित उपयोग के लिए उन्होंने सिंचाई की बौछारी विधि तथा टपक विधि अपनाए जाने पर विशेष बल दिया। कृषकों को अपनी खेती-बारी को पशुपालन व्यवसाय से एकीकृत करने को कहा तथा बताया कि इससे सड़ी गोबर की खाद उपलब्ध होने से जहां एक ओर रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटेगी, वहीं दूसरी ओर दुग्ध उत्पादन से कृषकों की आय भी बढ़ेगी। दक्षिणी परिसर के वरिष्ठ अध्यापक एवं आयुर्वेदाचार्य डा. देवनाथ सिंह गौतम ने आयुर्वेदिक औषधीय पौधों का उपयोग एवं उनकी कृषि के बारे में प्रशिक्षण दिया। डा. गौतम ने कहा कि झारखंड राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में औषधीय पौधों की कृषि के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। कृषि अभियांत्रिक वैज्ञानिक डा. एसके गोयल ने समसामयिक उन्नतशील कृषि यंत्रों के परिचालन व रखरखाव के बारे में जानकारी दी। कार्यक्रम समन्वयक डा. श्रीराम सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया तथा कार्यक्रम का संचालन डा. विनोद कुमार सिंह ने किया। इस दौरान सुनिता उरांव, उर्मिला उरांव, दिनेश तिर्की, गीता, सावित्री सहित झारखंड राज्य के 40 कृषक व महिला कृषक उपस्थित रहे।

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