गोली बनी है तो चलेगी

Meerut Updated Fri, 22 Nov 2013 05:42 AM IST
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मेरठ। गोली बनी है तो चलेगी ये कहना है परमवीर चक्र विजेता कैप्टन बाणा सिंह का। बाईपास स्थित होटल में दिल्ली पब्लिक स्कूल की प्रेसवार्ता के दौरान उन्होंने सेना में 26 साल पूर्व की यादों को लोगों के साथ साझा किया।
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आठ जम्मू कश्मीर राइफल के कैप्टन बाणा सिंह ने छह जून 1996 में सेना से जुड़े। सेना में 32 साल तक सेवा के दौरान उन्होंने दो बड़ी जंग लड़ी। पहली 1971 में शम सेक्टर में और दूसरी सियाचिन में 1987 में जंग लड़ी। वे मेरठ में 1980 से 1982 के बीच रहे। बचपन से उनके पिता अमर सिंह और माता पोली कौर ने ही सिखाया था कि सम्मान की सेवा सिर्फ सेना है। भारतीय कभी जंग नहीं चाहते जंग तो हम पर थोपी जाती है और फिर दुश्मन मुंह की खाते हैं। 1999 में अटल विहारी वाजपेयी के सेना के प्रति योगदान की बाणा सिंह ने तारीफ की। इस दौरान प्रधानाचार्य सविता चड्ढा, ज्ञानेंद्र चौधरी, पूनम वर्मा, नेहा आदि मौजूद रहे।
कायदे आजम बना बाणा टोप
- 26 जून 1987 में आठ जम्मू कश्मीर राइफल ने सियाचिन में पाकिस्तानी पोस्ट कायदे आजम पर लंबे प्रयास के बाद कब्जा किया था और उसका नाम बाणा टोप रखा गया। भारतीय सेना ने 1987 में पोस्ट पर कब्जे के लिए कई प्रयास किये और कई जवान शहीद हो गए। माइनस 45 डिग्री तापमान और लगभग 60 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार में हवा चल रही थी। 62 लोगों की टीम ने कैंप बनाया। जंग की सच्चाई बहुत ही भयानक होती है। सीधी चढ़ाई थी और हर कदम पर मौत का सामना कई बार पल्टन को पीछे हटना पड़ा। मगर आखिरकार विजय प्राप्त की और कायदे आजम को बाणा टोप बना दिया गया।
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