मिलों के चंगुल में न फंस जाएं गन्ना किसान

Meerut Updated Thu, 06 Dec 2012 05:30 AM IST
मेरठ। सरकार द्वारा गन्ना रेट घोषित नहीं करने पर किसान मिलों के चंगुल में फंसते जा रहे हैं। किसान विश्वास और गेहूं बुआई की मजबूरी में बिना घोषित रेट के ही मिलों को गन्ना बेच रहे हैं। जनपद के किसान 3 दिसंबर तक 44.08 लाख कुंतल गन्ना मिलों को दे चुके हैं। पुराने रेट (240 रुपये प्रति कुंतल) से इसकी कीमत 105 करोड़ रुपये से ज्यादा बैठती है। आशंका यह है कि घोषित रेट के खिलाफ शुगर मिल लॉबी अगर पहले की तरह कोर्ट चली गई, तो किसानों का भुगतान फंस सकता है।
किसानों के आक्रोश को देखते हुए शासन ने 19 नवंबर को शुुगर मिल तो चलवा दीं थीं, लेकिन पेराई सत्र 2012-13 के शुरू होने के 16 दिन बाद भी गन्ने का राज्य समर्थित मूल्य (एसएपी) जारी नहीं किया है। गन्ना विभाग ने घोषित होने वाले एसएपी का भुगतान करने का शपथपत्र शुगर मिलों से पहले ही ले लिया था। गेहूं बुआई की मजबूरी के चलते किसानों ने गन्ने की आपूर्ति जारी रखी है। गन्ना विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार 3 दिसंबर तक जनपद की मिलों में 44.08 लाख कुंतल गन्ने की खरीद हो चुकी है। इसमें से मिलों ने 43.31 लाख कुंतल गन्ना पेरकर दो लाख 71 हजार 481 कुंतल चीनी का उत्पादन कर लिया है।
पहले भी फंस चुका है भुगतान
सपा सरकार ने ही पेराई सत्र 2006-07 का गन्ना मूल्य 125 रुपये प्रति कुंतल घोषित किया था। तब चीनी मिलों ने इस रेट को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने 15 रुपये कम कर दिए थे। इसके बाद मिलों ने किसानों को 110 रुपये प्रति कुंतल का भुगतान किया था। वर्ष 2007-08 में भी गन्ना रेट 125 रुपये ही रहा था। इसमें भी कुछ चीनी मिलों ने 15 रुपये कम का भुगतान किया था। इस पर यूपी सरकार और राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के अध्यक्ष सरदार वीएम सिंह सुप्रीम कोर्ट चले गए थे। पिछले साल सुप्रीमकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा घोषित रेट को जायज ठहराते हुए भुगतान के अंतर को देने का आदेश दिया था।
चीनी मिल पुराने रेट पर भुगतान को तैयार
15 दिन के बाद भुगतान करने पर मिलों को ब्याज भी देना होता है। इस सत्र की पेराई शुरू हुए 16 दिन हो गए हैं। ब्याज से बचने के लिए मिलों ने गन्ना विभाग को पिछले साल वाले रेट से भुगतान करने और पुराने व नये रेट के अंतर का भुगतान एसएपी घोषित होने के बाद करने का ऑफर दिया है।
कर्ज लेकर हो रही गेहूं की बुआई
कर्ज लेकर तैयार की गई गन्ने की फसल किसानों को उधारी में देनी पड़ रही है। अब गन्ने का भुगतान नहीं होने पर गेहूं की फसल भी कर्ज लेकर बोनी पड़ रही है।

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