गैंगों को मिला क्राइम सर्टिफिकेट, बना स्पेशल ब्यूरो

Meerut Updated Wed, 10 Oct 2012 12:00 PM IST
मेरठ। जनपद में पहली बार हर गैंग को क्राइम सर्टिफिकेट दिया गया है। गैंग लीडर के साथ उसके सदस्यों की संख्या, अपराध विशेष में उसका दखल और उसके पारिवारिक सदस्यों से लेकर जमानतदारों तक का ब्यौरा कंप्यूटराइज्ड हुआ है। ऐसे गैंगों की कमर तोड़ने के लिए हर गैंग पर एक-एक अफसर को टास्क दिया गया है।
39 गैंग, 246 बदमाश
जनपद में इस समय 39 गैंग रजिस्टर्ड हैं। इनमें एक इंटरस्टेट (आईएस गैंग), तीन अंतर्जनपदीय (आईडी गैंग) और 35 जनपदीय गैंग (डी गैंग) हैं। इनमें मुस्तकीम, आलम मलिक और नीरज भाटी गैंग हाल में रजिस्टर्ड हुए हैं।
क्राइम सर्टिफिकेट: रवींद्र भूरा गैंग (हत्या, लूट डकैती), शरद त्यागी गैंग (फिरौती के लिए अपहरण, हत्या, डकैती), बिजेंद्र गैंग (फिरौती के लिए अपहरण, हत्या, डकैती), आकिल गैंग (रोड होल्डअप), प्रवीण गैंग (वाहन लूट), रियासत और अफजाल गैंग (अटैची चोर), आनेनबी गैंग ( ट्रक लूट), साहब तुल्ला गैंग (बिजली तार चोरी), फैजान गैंग (रंगदारी, हत्या लूट), रियासत गैंग (जाली नोट), इफ्तखार उर्फ सलमान गैंग (हाईवे लुटेरे), राहुल चौधरी गैंग (हार्डवेयर लुटेरे), इंसाफ अली गैंग (हथियार सप्लाई), अनीसू उर्फ पंडित (फिरौती के लिए अपहरण, भाड़े पर हत्या), नीरज भाटी गैंग (लूट)।
अपराध में अव्वल
गैंग लीडर और सदस्य अपने अपराध में अव्वल माने जाते हैं। जिले में कोई बड़ी वारदात होती है तो भले ही पुलिस को लंबी जांच के बाद पता चलता हो, लेकिन एक दूसरे गैंगों को तुरंत पता चल जाता है कि यह वारदात किस गैंग ने की होगी। फिरौती के लिए अपहरण और भाड़े पर हत्या कराने वाले गैंगों के अपने अलग शूटर होते हैं। कोई गैंग यदि दूसरे गैंग के काम में टांग अड़ाता है तो गैंगवार छिड़ने में समय नहीं लगता। अटैची चोर गैंग के सदस्यों की संख्या सबसे ज्यादा रहती है। मेरठ से हापुड़, दिल्ली, आगरा, राजस्थान, देहरादून, लखनऊ आदि जाने वाली बसों में ये गैंग अटैची पार करता है।
देहाती गैंग
मेरठ देहात के गैंगों में मिलों और सड़कों के ठेके हथियाने की होड़ रहती है। वहीं, कस्बों के धनाढ्य व्यापारियों से रंगदारी वसूलने के लिए अलग गैंग काम करता है। ये गैंग शहर में दखल नहीं देते। दायरा देहात में ही सिमटा रहता है।
कौन सा गैंग सबसे बड़ा
जनपद में सबसे बड़ा गैंग डी 52 ऊधम सिंह गैंग है। इसमें 13 सदस्य हैं। इसके बाद अंसार, फैजान और साबू गैंग आते हैं।
नहीं होती निगरानी
भले ही गैंग लीडर जेल में हों या मर गया हो, लेकिन गैंग की गतिविधियां जारी रहती हैं। पुलिस इन बदमाशों की निगरानी नहीं करती। गैंग के सदस्य लीडर से जेल में ही या पेशी पर मुलाकात करते हैं। वहीं से रंगदारी की पर्ची दी जाती है। पिछले तीन वर्षों से पुलिस रिकार्ड में गैंग सदस्यों की वही रटी रटाई संख्या चली आ रही है।
कहना इनका
गैंगों की कमर तोड़ने के लिए थानेदार से लेकर सभी सीओ और एसपी को टास्क दिया गया है। इसकी साप्ताहिक समीक्षा होगी। के. सत्यनारायणा, एसएसपी।

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