आजादी की लड़ाई का साक्षी गुरुकुल डोरली

Meerut Updated Fri, 10 Aug 2012 12:00 PM IST
मोदीपुरम। 9 अगस्त 1942 की वह शाम, जब गुरुकुल डोरली में संध्या हवन चल रहा था। छात्र और आचार्य मंत्रोच्चारण कर आहुति डाल रहे थे, तभी अंग्रेजी हुकूमत के आदेश पर घुड़सवार सैनिकों ने गुरुकुल को घेर लिया और सभी छात्रों को घर जाने की चेतावनी देकर गुरुकुल को बंद करा दिया था। इसके बावजूद देशभक्त छात्र और आचार्यों ने आजादी की लड़ाई नहीं छोड़ी और गिरफ्तारियां तक दीं। उस दौरान गिरफ्तार होने वाले छात्रों में डोरली निवासी वेदपाल शास्त्री भी थे। बाद में वेदपाल शास्त्री आचार्य बने और गुरुकुल में प्रधानाचार्य भी रहे।
आजादी की लड़ाई में वैसे तो मेरठ का गौरवमयी इतिहास रहा है, मगर उसमें गुरुकुल डोरली की भूमिका भी अहम रही। आचार्य वेदपाल शास्त्री ने बताया कि आठ अगस्त 1942 को कांग्रेस ने घोषणा पत्र जारी करके ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन’ का ऐलान किया था। नौ अगस्त को भारत भर में गिरफ्तारियां हुईं। उसी दिन अंग्रेजी सैनिकों ने गुरुकुल डोरली को घेर लिया था। तलाशी लेने के बाद जब कुछ नहीं मिला, तो छात्रों को घर भेज दिया गया और तालाबंदी करा दी थी। इसी दिन गुरुकुल के मंत्री एवं मुख्य अधिष्ठाता शिवदयालु जी को मेरठ में तिलक पार्क के निकट स्थित आवास से गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने बताया कि वह रात में चोरी छिपे घोषणा पत्र को हाथ से लिखते थे और फिर उन्हें भूसे में छिपाकर रख देते थे, ताकि किसी को वह न मिल सकें। इसके बाद उनका वितरण किया जाता था और दीवारों पर चिपकाया जाता था। तब आचार्य लेखराम शास्त्री से पुलिस ने छात्रों की नाम सहित सूची थाने पहुंचाने को कहा था, लेकिन इंकार करने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके बाद अक्तूबर में मेरठ के शीशमहल स्थित कांग्रेस के दफ्तर पर वह लोग इकट्ठा होकर पहुंचे थे और वहां से प्रदर्शन करते हुए घंटाघर चौराहे पहुंचे, जहां उन्हें सैनिकों ने गिरफ्तार कर लिया था। ढाई महीने तक तो उन्हें मेरठ जेल में रखा गया, जिसके बाद छह महीने तक आगरा की जेल में रखा गया। इसके अलावा गुरुकुल के आचार्यों में कृष्णानंद को खतौली में पुल तोड़ने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, जबकि राजेश्वर, वाचस्पति और हरिदत्त भी गिरफ्तार किए गए थे।
महात्मा गांधी, नेहरू जी और चंद्रशेखर आजाद आए थे गुरुकुल
गुरुकुल डोरली की स्थापना 1924 में हुई। इसके बाद आजादी की लड़ाई चली, तो 1945 में पंडित जवाहर लाल नेहरू यहां आए थे। इससे पहले 1929 में महात्मा गांधी गुरुकुल पहुंचे थे। आचार्य वेदप्रकाश शास्त्री बताते हैं कि चंद्रशेखर आजाद भी अपने साथियों संग एक बार रात में यहां आकर ठहरे थे।

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