‘जकड़न’ से आजाद होगा अबू मकबरा

Meerut Updated Mon, 02 Jul 2012 12:00 PM IST
मेरठ। केसरगंज में मकानों के बीच जकड़ा ऐतिहासिक अबू मकबरा वर्षाें बाद अतिक्रमण करने वालों के चंगुल से मुक्त हो सकेगा। मुगलिया सल्तनत के वजीर अबू मोहम्मद खान कंबोह क ी याद में 1688 में बनाए गए इस मकबरे का नामोनिशान मिटने के कगार पर है। शासन ने जिला प्रशासन से मकबरे को अतिक्रमण मुक्त कराकर रिपोर्ट तलब की है।
मेरठ से ऐतिहासिक धरोहरों का अस्तित्व मिट रहा है। मुगलिया सल्तनत के हुक्मरानों और नवाबों की रिहायश के लिए मशहूर रही इस भूमि पर ऐतिहासिक महत्व की इमारतें अतिक्रमण करने वालों से जूझ रही हैं। जिला प्रशासन और पुरातत्व विभाग की अनदेखी से धीरे धीरे इन इमारतों का नामोनिशान मिटता जा रहा है। इन्हीं में से एक मशहूर इमारत है केसरगंज स्थित अबू का मकबरा।
मुगलिया सल्तनत में वजीर रहे अबू मोहम्मद खान कंबोह क ी याद में उनके परिजनों ने 1688 में मकबरा बनवाया था। अब इस मकबरे को बचाने के लिए शासन ने जिला प्रशासन को जिम्मेदारी सौंपी है। शासन अनुसचिव संजय कुमार मिश्र ने जिला प्रशासन से इस मकबरे को अतिक्रमण मुक्त कराकर रिपोर्ट मांगी है।
आठ में से सात बुर्ज पर अतिक्रमण
अबू मोहम्मद खान कंबोह ने मेरठ में जलापूर्ति के लिए 1658 में काली नदी से एक नहर शुरू कराई थी, जो आज अबूनाले के नाम से मशहूर है। लाल रंग के बलुआ पत्थर से बने अबू मकबरे में आठ बुर्ज हुआ करती थीं, लेकिन आज आठ में से सात बुर्जों पर अतिक्रमण हो चुका है। मकबरे से सटी चार में से दो बुर्ज पहले ही अतिक्रमण की चपेट में थी, एक अन्य बुर्ज को भी एक परिवार ने रहने के लिए इस्तेमाल कर लिया है।
मकबरे की दूसरी चार बुर्ज मकबरे से दूर थीं, इनका अस्तित्व काफी पहले ही अवैध निर्माण के चलते खत्म हो चुका है। मकबरे में मैदान हुआ करता था, जो आज तबेला बन चुका है। मकबरे में तीन कब्र हैं, एक नवाब अबू, दूसरी उनके पिता और तीसरी अन्य सदस्य की हैं।

इनको भी चाहिए संरक्षण
खैरनगर गेट
कंबोह वंश के नवाब खैरंदेश कंबोह ने 1690 में खैरनगर गेट बनवाया था। छतरी वाले पीर से फुहारा चौक के बीच स्थित इस दरवाजे में पिछले कई साल से पुलिस चौकी चल रही है। इस दरवाजे की नक्काशी भी खत्म हो चुकी है।
शमशुद्दीन मकबरा
नवाब शमशुद्दीन खान कंबोह की याद में थापर नगर में यह मकबरा बनवाया गया था। शमशुद्दीन, खैरंदेश के भतीजे थे। आजादी के बाद से इस मकबरे पर ताला जड़ा है, मकबरा वक्फ बोर्ड की संपत्ति है, मगर वर्तमान में मकबरे के बराबर से अवैध निर्माण हो रहा है। यह मकबरा मुगल कालीन इमारतों की तर्ज पर बना हुआ है।
खैरंदेश का मकबरा
खैरनगर बसाने वाले नवाब खैरंदेश कंबोह की याद में बना खैरंदेश का मकबरा आज मकानों के बीच जकड़ा हुआ है। पटेल हिंदी संस्थान के पीछे पटेल नगर में बने इस मकबरे की झलक पाने के लिए भी मशक्कत करनी पड़ती है। मकबरे को चारों ओर से मकानों ने जकड़ लिया है।

क्या कहता है कानून
प्राचीन स्मारक, पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 के तहत 100 साल पुरानी सभी ऐतिहासिक इमारतों पर अवैध निर्माण कानूनन अपराध है। अधिनियम के अनुसार 100 वर्ष पुरानी सभी इमारतें चाहें वे संरक्षित हों या असंरक्षित, उनसे 100 मीटर के दायरे में निर्माण कार्य करने पर सजा और जुर्माना दोनों का प्रावधान है।


जनपद में ऐसी कई ऐतिहासिक धरोहर और पुराने मकबरे हैं, जिन्हें संरक्षण मिलना चाहिए, लेकिन वे अपना अस्तित्व खो रही हैं - डॉ. मनोज गौतम, संग्रहालय अध्यक्ष
मेरठ की ऐतिहासिक धरोहरों पर शासन कभी गंभीर नहीं हुआ, जिसकी वजह से आज ऐतिहासिक इमारतें दिखाई भी नहीं पड़तीं हैं। शहर में ऐसी धरोहरों की लंबी सूची है, मगर अवैध निर्माण ने इन इमारतों को खत्म कर दिया है - डॉ. केडी शर्मा, वरिष्ठ इतिहासकार

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