गांधी के देश में खादी की हो रही दुर्गति

Mau Updated Tue, 02 Oct 2012 12:00 PM IST
मऊ। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस ग्राम स्वराज्य का सपना देखा था वह आज धूमिल हो रहा है। हर हाथों को काम और हर किसी को रोजगार के उद्देश्य से शुरू किए गए खादी ग्रामोद्योग की चमक तो पूंजीपतियों के कंपनियों ने धूमिल कर दी, जो बची हैं वह भी सही देखरेख के अभाव में दम तोड़ रही है। खादी के वस्त्रों पर आधुनिकता का रंग न चढ़ पाने के चलते वह आज महंगे तो हैं ही कुछ खास लोगों की पहुंच तक ही हैं। गांधी के चरखे तो आज लगभग बंद हो चुके हैं। गांधी के इस देश में खादी की हो रही ऐसी दुर्गति पर न तो शासन प्रशासन और न ही आम आदमी जागरूक दिख रहा है।
जिले में ग्राम्य स्वराज्य की परिकल्पना के आधार पर खादी ग्रामोद्योग शुरू किया गया। खादी से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं की आज भी जिले में लगभग 47 दुकानें हैं, जहां खादी ग्रामोद्योग से संबंधित वस्तुएं बेची जाती है। इन दुकानों की हालत भी सब्सिडी पर ही निर्भर रहती है। अर्थात इनके घाटे छूट और सब्सिडी के आधार पर ही पूरे होते हैं। एक तरफ जहां खादी आम आदमी से दूर हो चली है वहीं उसकी निर्मित वस्तुओं की पूछ भी आम आदमी में कम हो गई है। खादी के कपड़े अच्छे तो हैं लेकिन वह सस्ता एवं फैशन वाले न होने के चलते आम आदमी से दूर हो गए है। जब कि खादी ग्रामोद्योग से चलने वाली प्राइवेट इकाइयां जिले में निजी तौर पर फायदे में चल रही हैं। सूत कातने वाली महिलाएं भी विभागीय उदासीनता के चलते यह काम नहीं कर रहीं। सूत कातने के बदले उन्हें उनका श्रम मूल्य में न मिलने एवं रूई की उपलब्धता न होने के चलते उनका भी मोहभंग हो चुका है। आज शोपीस के रूप में ही कहीं कहीं इन चरखों का प्रयोग होता है। खादी ग्रामोद्योग अधिकारी जेपीएन सिंह कहते हैं विभाग द्वारा मुख्यमंत्री रोजगार योजना के तहत लगाई गई यूनिटें अच्छा रिस्पांस दे रही हैं। इससे लोगों को रोजगार मिल रहा है। कहा कि खादी की दुर्दशा के पीछे जागरूकता की कमी है। शासन से इसके लिए जो सुविधाएं आती हैं दी जाती हैं।
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प्रतिवर्ष एक करोड़ से अधिक का होता है उत्पादन
मऊ। जिले में मुहम्मदाबाद गोहना सहित विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित खादी ग्रामोद्योग के तहत अगरबत्ती, गमछा, कंबल, तौलिया, सूत का उत्पादन प्रतिवर्ष एक करोड़ से अधिक का होता है।
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कर्मचारियों की हालत आज भी नहीं बदली
मऊ। ग्रामी ग्रामोद्योग की दुकानों पर लगाए गए कर्मचरियों की हालत जैसी पहले थी उसी प्रकार आज भी है। 55 से अधिक उम्र तक के लोगों को भी आज चार हजार रुपये में ही अपना गुजारा करना पड़ता है। चार हजार रुपये में यह अपनी सेवा देते हैं और परिवार का किसी प्रकार पेट पालते हैं। बेरोजगारी के दौर में पहले तो कर्मचारी मिल भी जाया करते थे लेकिन अब जो रिटायर हो रहे हैं उनकी जगह भरनी भी मुश्किल हो गई है। शिवदयाल सिंह और रघुनाथ मौर्य कहते हैं कि महंगाई के इस दौर में वह किसी प्रकार इतने पैसे में अपने परिवार का गुजारा करते हैं। जयराम विश्वकर्मा कहते हैं सरकार को कर्मचारियों के हितों के बारे में सोचने की फुरसत नहीं है।
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200 से अधिक प्राइवेट उद्योग
मऊ। जिले में खादी ग्रामोद्योग का स्वरूप बदलने के लिए स्वरोज को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत मुख्यमंत्री रोजगार योजना के तहत उद्यमियाें को ऋण पर छूट दी जाती है। जिले में अचार, मुरब्बा, बक्सा बखार सहित विभिन्न रोजगार से संबंधित प्राइवेट 200 यूनिटें स्थापित हैं, जो फायदे में चल रही हैं।

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