विभागीय उपेक्षा से दम तोड़ रही संचयिका

Mau Updated Mon, 17 Sep 2012 12:00 PM IST
मऊ। बचत के महत्व को बताने और अल्प बचत के उद्देश्य से शुरू की गई संचयिका जैसी महत्वपूर्ण योजनाएं विभागीय उपेक्षा के चलते दम तोड़ती नजर आ रही हैं। संचयिका दिवस पर जब पड़ताल करने की कोशिश की गई तो अधिकांश लोगों को इसके बारे में पता भी नहीं है कि संचयिका होती क्या है। जबकि जिले में एक बाकायदा महकमा बनाया गया है, जो लोगों को छोटी-से छोटी बचत के लिए उकसाए व जागरुक करे। लेकिन वर्षों से संचयिका खाते का संचालन बंद चल रहा है। विभागीय अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।
बच्चोें में बचपन से बच्चों से छोटी बचत करने की आदत डालने के लिए 15 सितंबर को संचयिका दिवस के रूप में पूरे विश्व में मनाया जाता है। एक रुपया बचाना एक रुपये कमाने के बराबर है। यह धारणा व्यक्ति में विकसित होती है, तो देश में किसी भी भावी संकट को आसानी से निपटा जा सकता है। सरकार ने कक्षा छह से 12 वीं तक के छात्रों में बचत को कानूनी रूप देते हुए बाकायदा स्कूलों में संचयिका बैंक की व्यवस्था की थी। जिसमेें बकायदा बच्चे अपने पाकेटमनी से महीने में 10 रुपये से अधिक की बचत कर सकते थे। शिक्षा समाप्ति के बाद जब उन्हें इसकी जरूरत महसूस होती थी वे अपने संचयिका खाते से साधारण प्रार्थना पत्र पर अपने कक्षाध्यापक से नोड्यूज कराकर अपना पूरा पैसा संचयिका प्रभारी से ले सकते थे। इसका संचालन जिला अल्प बचत अधिकारी के निर्देशन में डाकघरों में खाता खोल कर किया जाता था, लेकिन दुर्भाग्य से न तो इसमें विद्यालयों की रुचि रही और न ही डाक विभाग और न ही अल्प बचत विभाग ने इस पचड़े में पड़ना उचित समझा। जबकि जनपद में कक्षा छह से बारहवीं में लगभग छह लाख से अधिक छात्र पढ़ते हैं। हालत यह है कि इस योजना के तहत वर्ष 2005 से संचयिका खाते का संचालन ही नहीं हो रहा है। आला अधिकारी सरकार से टेबुलेशन चार्ट न आने का रोना रो रहे हैं। काफी समय से संचयिका खाते का संचालन न होने से अब शायद ही किसी स्कूल में संचयिका का मतलब किसी को मालूम होगा और शायद ही गुरुजी कभी किसी छात्र को यह समझाते होंगे कि अपने बुरे दिनों के लिए हर व्यक्ति को कुछ न कुछ बचाकर रखना चाहिए।

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क्या कहते हैं अर्थ शास्त्री
रामबचन सिंह राजकीय महिला महाविद्यालय बगली पिजड़ा के प्राचार्य व अर्थशास्त्री डा.नंदलाल मौर्या कहते हैं कि बचत व कर्ज एक दूसरे के पूरक हैं। अगर किसी समाज में बचत करने से ज्यादा कर्ज लेने की प्रवृत्ति बढ़ जाए तो वह अपने आप पराश्रित हो जाएगा और छोटी बचत का महत्व बड़ी बचत से कहीं ज्यादा होता है, क्योंकि इससे सहभागिता और भी बढ़ जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी छोटी बचत का महत्व बरकरार है। किंतु शहरों के अंधानुकरण में नया समाज बचत को भूलता जा रहा है। भारत में सोने के गहनों का महत्व शायद इसी बचत का प्रतीक है। अगर किसी देश में संचय की भावना न हो तो उसका विकास भी अवरुद्ध हो जाएगा।

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क्या कहते हैं अधिकारी
सहायक निदेशक बचत कमला प्रसाद का कहना था कि सरकार से संचयिका का प्रपत्र व टेबुलेशन चार्ट ही नहीं आया है। ब्याज दर का पता ही नहीं है।

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