कैसे पढ़ें श्रमिकों के मेधावी मुन्ने

Mau Updated Sun, 19 Aug 2012 12:00 PM IST
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पुष्पेंद्र कुमार त्रिपाठी
मऊ। सभी प्रकार के निर्माण कार्य में लगे श्रमिकों के बच्चों को शासन की तरफ से शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करने और उन्हें उच्च एवं व्यावसायिक शिक्षा से जोड़ने की योजना पर जिले में पानी फिरता नजर आ रहा है। यदि योजना का सही क्रियान्वयन हो तो जिला श्रम कार्यालय में पंजीकृत पांच सौ से ज्यादा श्रमिकों के बच्चों को मेधावी छात्र पुरस्कार योजना का लाभ जरूर मिलता। लेकिन इस ओर सोचने के लिए न तो जिलाधिकारी के पास समय है और न ही श्रम विभाग को फुरसत। तभी तो एक वर्ष तीन माह पूर्व शासनादेश आने के बावजूद सभ्य मानवों की बस्तियां बनाने वाले श्रमिकों के नन्हें-मुन्ने सीमेंट और गिट्टी के बीच ही अपना भविष्य तराश रहे हैं।
ऐसे श्रमिक जो भवन एवं अन्य समस्त निर्माण कार्य में लगे हैं और जिला श्रम विभाग में अपना पंजीयन कराए हैं उनके लिए केंद्र सरकार द्वारा कई कल्याणकारी योजनाएं संचालित की गई हैं। जिनके अनुपालन के क्रम में प्रदेश सरकार के भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड के सचिव द्वारा सभी जिलाधिकारियों को श्रमिकों के बच्चों के लिए मेधावी छात्र पुरस्कार योजना से संबंधित अधिसूचना 13 मई 2011 को जारी की गई थी। इसके तहत कक्षा पांच से लेकर एमबीबीएस और आईआईटी तक की पढ़ाई के लिए आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है। योजना में देय हितलाभ 4000 रुपये सालाना से शुरू होकर 22000 रुपये तक का है। आवेदन के दिन से भुगतान के दिन तक की अवधि शासन द्वारा साठ दिन निर्धारित की गई है। ऐसी महत्वाकांक्षी योजना जागरूकता के अभाव में जिले में दम तोड़ रही है। लगभग पांच सौ से अधिक पंजीकृत श्रमिकों के बीच महज दस श्रमिकों ने योजना के लाभ के लिए आवेदन किया है। पर अभी तक उनके आवेदन का क्या हुआ यह खुद वे भी नहीं जानते। इस बाबत जिला श्रम कार्यालय के प्रभारी अधिकारी ने बताया कि अभी नया-नया प्रभार मिला है और बीमारी के चलते बाहर हूं। उधर, जिलाधिकारी कुंवर विक्रम सिंह का कहना है कि योजना महत्वपूर्ण है और संज्ञान में हैं। लेकिन श्रम कार्यालय से कोई प्रस्ताव मेरे पास नहीं आया है। इसको दिखलवाऊंगा, जो भी लाभार्थी होगा उसे जरूर लाभ मिलेगा। बहरहाल लाभ मिलेगा या नहीं यह तो वक्त बताएगा। लेकिन तब तक समय बीत जाएगा और एक बार फिर कई श्रमिकों के बच्चे जानकारी के अभाव और सरकारी उदासीनता के चलते अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने से वंचित रह जाएंगे।


सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ीं योजनाएं
मऊ। श्रमिक आंदोलनों के अगुआ और एटक के महामंत्री सूर्यदेव पांडेय ने बताया कि शासन ने श्रमिकों के जीवन से मृत्यु तक के लिए कई योजनाएं संचालित कर रखी हैं। लेकिन श्रम विभाग की बेपरवाही और जिला प्रशासन की उदासीनता से योजनाओं का लाभ श्रमिक नहीं ले पा रहे हैं। उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद समाज के एक बड़े वर्ग के बीच योजनाएं जागरूकता और क्रियान्वयन के अभाव में दम तोड़ रही हैं, यह बेहद दुख और चिंता का विषय है।


पैसा पर्याप्त, न जाने क्यों मिलता नहीं
मऊ। निजी निर्माण को छोड़ कर जो भी निर्माण कार्य होते हैं, उनके कुल बजट की दो प्रतिशत राशि जिला श्रम कार्यालय के पास संबंधित विभाग, निर्माण एजेंसियां या ठेकेदार जमा करते हैं। इस नाते बजट तो पर्याप्त है। लेकिन श्रमिकों को शिशु हित लाभ योजना, दुर्घटना में मृत्यु पर मुआवजा, अपंगता में सहायता राशि, कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए आर्थिक सहायता और साठ साल के बाद पेंशन जैसी दर्जनों कल्याणकारी योजनाओं से वे अब तक क्यों वंचित है इसका वाजिब जवाब किसी के पास नहीं है।

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