करोड़ों का बजट लेकिन मजदूर बेकार

Mau Updated Sat, 18 Aug 2012 12:00 PM IST
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मऊ। इसे जिले की ग्राम पंचायतों का दुर्भाग्य कहे या प्रशासनिक उदासीनता का नायाब नमूना लेकिन महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी के तहत जिले को एक अरब 22 करोड़ से अधिक का भारी भरकम बजट आवंटित होने के बाद भी ग्राम निधियों में धन नहीं है। गांवों में धन न होने से जहां विकास कार्यों को गति नहीं मिल पा रही है वहीं मजदूरों को काम नहीं मिल पा रहा है। जॉबकार्ड धारक मजदूर कभी प्रधान तो कभी विभाग का चक्कर लगा रहे हैं तो कई बार जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन भी कर चुके हैं। बावजूद इसके एमआईएस फीडिंग या कोई अन्य बहाना बनाकर ग्राम पंचायतों के खाते में धन नहीं भेजा जा रहा है। इसके चलते लक्ष्य के सापेक्ष धन खर्च हो पाएगा या नहीं इसमें संशय है।
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वित्तीय वर्ष 2012-13 में मनरेगा के तहत जिले की 598 ग्राम पंचायतों में जॉबकार्ड धारकों को रोजगार उपलब्ध कराने एवं विभिन्न विकास कार्यक्रमों के लिए शासन से एक अरब 22 करोड़ 81 लाख 20 हजार खर्च करने का लक्ष्य निर्धारित है। इस धन को खर्च करने के लिए ग्राम पंचायतों को सीधे 7012.03 लाख, 2700 लाख क्षेत्र पंचायत और 1000 लाख जिला पंचायत के साथ ही 1569.25 लाख धन लाइन विभाग को आवंटित है। प्रथम किस्त के रूप में अधिकांश ग्राम पंचायतों को धन आवंटित भी कर दिया गया है लेकिन दूसरी किश्त न आने से अधिकांश जगह धन का सूखा पड़ा है। विभागीय उदासीनता का कारण एमआईएस फीडिंग हो या कोई अन्य कारण लेकिन ग्राम प्रधान से लेकर मनरेगा मजदूर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। मजदूरों को जहां रोजगार नहीं मिल पा रहा है वहीं गांवों में विकास कार्य अवरुद्ध हैं। खासकर रानीपुर एवं रतनपुरा ब्लाक की स्थिति और भी गड़बड़ है। यहां ग्राम पंचायत ही नहीं क्षेत्र पंचायतों के मद में खर्च होने वाला मनरेगा का धन इन दिनों नहीं है। इस संबंध में परियोजना अधिकारी बैजनाथ राम का कहना है कि जिन ग्राम पंचायतों में धन नहीं है उसके लिए एपीओ को निर्देश दिया गया है कि वह डिमांड तत्काल भरकर सूचना उपलब्ध कराएं। ग्राम पंचायतों में धन की कमी नहीं होने दी जाएगी। बताया कि एमआईएस फीडिंग पूरी न होने पर भी कुछ ग्राम पंचायतों में समस्या आ रही है।
पिछले वर्ष भी नहीं खर्च हो पाया था धन
मऊ। मनरेगा के तहत पिछले वित्तीय वर्ष में भी एक अरब 22 करोड़ 74 लाख रुपये का बजट आवंटित हो पाया था। इसमें विभाग को 77.1 करोड़ रुपये उपलब्ध भी कराए गए थे लेकिन विभागीय उदासीनता एवं सुस्त रवैया के चलते इतना भी धन नहीं खर्च हो पाया था। विभाग जैसे तैसे 69.12 करोड़ ही खर्च कर पाया था। इसके चलते जहां नाममात्र के मनरेगा मजदूरों को 100 दिन का रोजगार मिल पाया था वहीं किसी तरह मानव दिवस सृजित करने का लक्ष्य पूरा हो पाया था।

कहीं कमीशनबाजी का तो खेल नहीं...
मऊ। ग्राम पंचायतों में धन भेजे जाने में कहीं कमीशनबाजी का तो खेल नहीं है इसे लेकर भी दबी जुबान से चर्चाएं हैं। हालांकि हकीकत चाहे जो हो लेकिन असलियत तो यही दिख रही है कि विभाग से ग्राम पंचायतों द्वारा धन लिए जाने में तरह-तरह की मुसीबतें झेलनी पड़ती है।
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