प्रत्याशी बेचैन और वोटर खामोश

Mau Updated Wed, 20 Jun 2012 12:00 PM IST
मऊ। जिले की एक मात्र नगर पालिका में वर्ष 2012 का निकाय चुनाव काफी दिलचस्प दौर में है। यहां मतदाता खामोश हैं, लेकिन उनकी खामोशी देखकर प्रत्याशी बेचैन नजर आ रहे हैं। महिला सीट होने के नाते मतदाता यहां उनका नेतृत्व परख रहे हैं। हालांकि कई प्रत्याशी अभी अपने पति के बल पर ही चुनाव लड़ रही हैं और खुद भी पर्दे से बाहर नहीं आना चाहती हैं, जबकि कई महिला प्रत्याशी अपने नेतृत्व का प्रदर्शन कर मतदाताओं में विश्वास जगाने के लिए रात दिन एक किए हुए हैं। यही नहीं काफी दिन बाद मिले मौके के चलते यहां महिला प्रत्याशी मतदाताओं से अपना हक मांग रही हैं।
जिले की एकमात्र नगर पालिका मऊनाथ भंजन में मतदाताओं की संख्या दो लाख 8601 है। यहां चेयरमैन बनने के लिए एक दो नहीं 16 प्रत्याशी मैदान में है और अपनी एड़ी से चोटी तक का पसीना बहा रहे हैं। महिला सीट होने के चलते यहां जिले की कई नामचीन एवं प्रतिष्ठित महिलाएं भी चुनाव मैदान में हैं। वहीं पुराने पुरुष दिग्गज प्रत्याशियों की बेगम भी चुनाव लड़ रही हैं। मतदाता प्रत्याशियों को लेकर ऊहापोह की स्थिति में होने के चलते खामोश होकर सभी को परख रहे हैं। मतदाताओं की खामोशी को लेकर प्रत्याशियों में इस कदर बेचैनी है कि वह अपने हार जीत का समीकरण तक नहीं फिट कर पा रहे हैं। पूर्व चेयरमैन अरशद जमाल की पत्नी शाहिना जमाल और निवर्तमान चेयरमैन मुहम्मद तैयब पालकी की बेगम रजिया सुल्ताना घूंघट की आड़ से ही मतदाताओं को विश्वास दिलाने में लगी हैं। वह अपने पति के किए गए कार्यों को लेकर जनता का स्नेह पाना चाहती हैं, जबकि इनके अलावा चिकित्सकीय पेशे से जुड़ी डा. अर्शिया, साहित्य से जुड़ी डा. मधु राय के साथ ही भाजपा की प्रत्याशी सरोज लता पिछले चुनाव में पति के दूसरे नंबर पर रहने का फायदा लेने जनता के बीच में हैं।
इनके अलावा कांग्रेस की सीमा परवीन, राना खातून, विमला पांडेय, इंदूमती, हनीफा नोमानी, ऊषा भारती, सिमरन खां सहित 16 महिला प्रत्याशी नगर पालिका वासियों से इस बार नेतृत्व की क्षमता के बल पर वोट मांग रही हैं। कई महिलाएं तो बकायदा इसके लिए पार्टीगत आवाज भी उठा चुकी हैं कि महिलाओं की सीट पर भी पुरुष नेतृत्व को ही क्यों महत्व दिया जा रहा है। इसे लेकर खासकर सपा और भाजपा में अंदरखाने विरोध के भी स्वर उभर चुके हैं। इन महिलाओं का तर्क है कि जब पुरुष सीट होने पर भी उन्हें वोट और मौका उसी प्रत्याशी के नाम को देना है तो फिर महिला संगठन या महिला सीट होने का मतलब ही क्या है। बहरहाल प्रत्याशियों के चयन को लेकर मतदाता काफी ऊहापोह की स्थिति में हैं। फिर भी इस सीट पर पुराने दिग्गजों की लड़ाई को कम करके नहीं आंका जा सकता है। इसके चलते इन दिनों प्रत्याशियों में मतदाताओं का विश्वास जीतने की होड़ मची है। अब देखना है आने वाले दिनों में मतदाताओं की खामोशी कोई नया इतिहास रचती है या पुराने चेहरे में ही किसी को मौका देती है, यह भविष्य के गर्भ में है।

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