कम्युनिस्ट और कांग्रेस का रहा दबदबा

Mau Updated Wed, 13 Jun 2012 12:00 PM IST
कोपागंज। ब्रिटिश हुकूमत से ही अपना अस्तित्व बनाए हुए नगर पंचायत कोपागंज में निकाय चुनाव को लेकर एक बार फिर राजनीति गरमाई हुई है। नगर पंचायत कोपागंज कभी कम्युनिस्ट पार्टी का गढ़ रहा, लेकिन इस मजबूत किले को कांग्रेस ने तोड़ा था। कोपागंज नगर पंचायत में कम्युनिस्ट और कांग्रेस के बीच टक्कर रही, लेकिन पिछले कई चुनावों से यहां कम्युनिस्ट पार्टी बैकफुट पर है। यहां कई चेयरमैन ऐसे रहे हैं जिन्हें कई बार नेतृत्व करने का मौका मिला है।
कोपागंज नगर पंचायत ब्रिटिश हुकूमत में 1860 को ही अस्तित्व में आ चुकी थी। लेकिन 1936 से ही यहां चेयरमैन चुने जाते रहे। तब से आज तक अध्यक्ष पद को लेकर यहां हर चुनाव में गहमागहमी रहती है। सर्वप्रथम 1936 में चेयरमैन की कुर्सी पर बैठने का सौभाग्य फैजुल्लाह को मिला जो कांग्रेस विचारधारा से जुड़े रहे। इसके बाद 1943 में कांग्रेस के महादेव तिवारी चेयरमैन चुने गए। तीसरे चेयरमैन के रूप में 1948 में हाजी इदरीश को मौका मिला। वहीं चौथे चेयरमैन पार्टी यूसुफ वकील 1952 में बने। पांचवां चेयरमैन बनने का मौका जनता ने 1957 में कम्युनिस्ट पार्टी के ही मुस्तफा को दिया। इसके बाद 1962 में छठवां चेयरमैन बने कम्युनिस्ट पार्टी के इकबाल को कोपागंज नगर पंचायत की जनता ने सिर आंखों पर बैठा लिया। वह लगातार सातवां, आठवां, 9वां, 10वां यानी 1990 तक चेयरमैन की कुर्सी की शोभा बढ़ाते रहे। 1995 में भी इनकी ही बहु इशरत बानो ने समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ा। यहां की जनता ने उन्हें कुर्सी पर बैठाया। इसके बाद यहां कम्युनिस्ट पार्टी का सूरज आज तक अस्त है। इनके बाद चेयरमैन के रूप में कांग्रेस से नसीम अहमद ने वर्ष 2000 कुर्सी पर झंडा गाढ़ा। वहीं 2006 के चुनाव में यह कुर्सी कांग्रेस से हेलाल अहमद ने हथिया ली और वह 13वें चेयरमैन के रूप में निवर्तमान अध्यक्ष हैं। एक बार फिर वह कांग्रेस से ही चुनाव मैदान में हैं। जबकि उन्हें सपा, बसपा ही नहीं निर्दल प्रत्याशियों से भी कड़ी टक्कर मिल रही है।

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