आशियानों को ढूंढती रहीं निगाहें

Mau Updated Sat, 26 May 2012 12:00 PM IST
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मधुबन(मऊ)। पब्बर, मनमम और धुस के लोगोें का सब कुछ गुरुवार की भीषण आग में स्वाहा हो गया है। रोटी, कपड़ा और मकान सभी के लिए अब दूसरे का ही सहारा रह गया है। दर्द और थकान के बीच रात काटने के बाद जब शुक्रवार की सुबह को लोग एक दूसरे से मिले तो बिना कुछ कहे ही भीगी पलकों से बहुत कुछ कहते नजर आए। रह-रह कर आ रही महिलाओं के रोने की आवाज पूरे माहौल को और भी बोझिल कर दे रही थी। हालांकि इन सबसे दूर बच्चे अपनी ही मस्ती में मगन थे। लेकिन भूख और प्यास ने उन्हें भी एहसास करा दिया कि उनके गांव में कोई बड़ी दुर्घटना हुई है। इसके पहले गुरुवार की रात बच्चे भूख से तड़पते हुए मां की गोद में ही सो गए। रात को बारह बजे लोगों को भोजन मिला। शुक्रवार को भी दिन के दो बजे तक यही क्रम चला। किसी को भोजन नसीब हुआ तो कोई भूखे पेट रहा। पेयजल और खाद्यान्न के साथ पीड़ित तन ढकने तक के लिए मोहताज हैं। प्रशासन की ओर से अभी तक कोई माकूल इंतजाम नहीं किया जा सका है। जिससे लोगों में काफी आक्रोश है।
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आग से तबाह हुए 150 परिवार जिंदगी जीने के लिए तरस रहे हैं। आग की घटना ने उनके ऊपर पर वज्रपात ढाह दिया है। गुरुवार को हुई घटना के बाद अग्नि पीड़ितोें को पानी और भोजन के लिए अभी तक कोई इंतजाम नहीं किया जा सका है। रात में बच्चे भूखे पेट ही मां के गोद में सो गए। शुक्रवार को दो बजे तक भोजन नहीं नसीब हुआ। चहुुंओर तीनों पुरवे में बच्चों के रोने की चीख और भूख से तड़प ने झकझोर कर रख दिया था। अपराह्न चावल और दाल कुछ लोगों को नसीब हो पाया। हैंडपंप भी आग की भेंट चढ़ने से लोग पेयजल के लिए तरस रहे हैं। लू के थपेड़ों के बीच लोग तपती जमीन पर सोने के लिए मजबूर हैं। पीड़ितों के रहने के लिए न तो काई टेंट की व्यवस्था की गई है। न ही खाने के लिए खाद्यान्न ही दिया जा सका है। महिलाएं बची हुई साड़ी को धूप से बचने के लिए टेंट की शक्ल में डालकर रह रही हैं। लोग अपने घरों के पास तक जा रहे थे। महिलाएं दीवारों के खंडहर को छू-छू कर रो रही थी। पब्बर चौहान का कहना है कि यदि कोई समय से इंतजाम नहीं हुआ तो लू और भूख से लोगों की मौतें होने लगेंगी। नरेश चौहान का कहना है कि रात में 12 बजे के बाद आनन-फानन मेें किसी तरह से पूड़ी और सब्जी मिल पाई। बच्चे भूख से ही तड़पते सो गए। प्रशासन की लापरवाही के प्रति काफी लोगों मेें आक्रोश है।
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