शहीदों के परिवारीजनों को दी गई बंजर जमीन

Mathura Updated Fri, 21 Dec 2012 05:30 AM IST
मथुरा। सैनिकों ने देश की माटी को अपने लहू से सींचा, मुल्क की खातिर अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनके परिवारीजनों का सम्मान कुछ यूं किया गया कि उनके नसीब में बंजर जमीन आई। 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के परिवारीजनों को सांत्वना के नाम पर बंजर जमीन ही देकर इतिश्री कर ली गई। उपेक्षा के शिकार शहीदों के परिवारों का आज बंजर जमीन और मिलने वाली पेंशन से गुजारा तक ठीक से नहीं हो पा रहा है। परिवारीजनों को अपनी बदहाली से बड़ा गम प्रदेश, केंद्र सरकार और सेना द्वारा की गई उपेक्षा का है।

केस- एक
थाना गोवर्धन के गांव भवनपुरा की रमा देवी की शादी बुलंदशहर के गांव खादौर निवासी सैनिक छत्तर सिंह के साथ हुई थी। 1971 की लड़ाई में छत्तर सिंह के शहीद हो जाने के बाद से रमा देवी मायके भवनपुरा आ गईं। भवनपुरा में जमीन देने के नाम पर ग्राम प्रधान ने बंजर जमीन पर मकान बनाने को जमीन का पट्टा कर दिया लेकिन दबंगों ने मकान नहीं बनाने दिया। इस पर सेनाधिकारियों को अवगत कराया लेकिन कुछ नहीं हुआ। अब सेना की ओर से 10 हजार पेंशन मिलती है। बहन के बेटे को गोद रख लिया। उसी के साथ पेंशन से गोवर्धन में रहकर गुजारा करती हैं। पेट्रोल पंप या गैस ऐजेंसी की मांग की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

केस दो-
थाना शेरगढ़ के गांव पीरपुर निवासी निन्नू सिंह भी 1971 की लड़ाई में शहीद हुए थे। सरकार की ओर से शहीद की पत्नी सुक्खो देवी को सात बीघा बंजर जमीन और 21 हजार रुपये दिए गए। रुपये किस्तों में दिए। खेती को उपजाऊ बनाने के अब तक प्रयास हो रहे हैं। अब जाकर पांच हजार पेंशन मिलने लगी है। बेटे इंदर को भी सेना में नौकरी नहीं दी गई। गांव में रहकर भैंस पाल रही हैं और दूध बेचकर गुजारा कर रही हैं।

केस तीन-
बलदेव के गांव जादोंपुर के मानसिंह के दो बेटे, सोनपाल सिंह व महेंद्र सिंह एक साथ एक ही दिन सेना में भर्ती हुए और दोनों एक ही दिन 1971 की लड़ाई में शहीद हुए थे। दोनों की शहादत के बाद हालांकि उसने तीसरे बेटे छोटे लाल को भी सेना में भेजा लेकिन बाद में उसे वापस बुला लिया। सोनपाल की मां कपूरी देवी ने बताया कि सोनपाल की शहादत पर सरकार से तीन एकड़ बंजर जमीन का पट्टा दिया वहीं महेंद्र की शहादत पर उन्हें न के बराबर पेंशन दी गई। इस उपेक्षा से मानसिंह आहत हुए और तीसरे बेटे छोटे लाल की नौकरी छुड़वा दी और घर बुला लिया। क पूरी देवी बताती हैं कि 2008 के बाद से पेेंशन कुछ ठीक मिलने लगी हैं। हालांकि सोनपाल के बेटे गुड्डू को आज तक नौकरी नहीं दी गई।

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