शहर में दम तोड़ रहा निवाड़ उद्योग

Mathura Updated Sat, 27 Oct 2012 12:00 PM IST
मथुरा। तीन दशक पहले तरक्की की बुलंदियों को छूने वाला डोरी निवाड़ उद्योग अब अर्श से फर्श पर आ गया है। शहर में न तो लोगों में निवाड़ खरीदने के प्रति उतना रुझान रहा और नहीं इस उद्योग के लिए बिजली और कम कीमत पर कच्चा माल ही मुहैया हो पा रहा है। अब हालात यह कि ये उद्योग अपनी अंतिम सांसें गिर रहा है।
नगर की निवाड़ तीन दशक पूर्व इस कदर प्रसिद्ध थी कि दूर-दराज से लोग यहां आकर डोरी निवाड़ खरीदते थे। शहर का एक बाजार भी डोरी बाजार के नाम से मशहूर था लेकिन बदलते जमाने में लोग प्लाईवुड की अधिक महत्व देने लगे वहीं सरकार ने भी इस उद्योग को तवज्जो नहीं दी। मजदूरों ने भी इन हालातों को देखते हुए इस काम से मुंह मोड़ लिया ऐसे में अब इस उद्योग पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। मथुरा में डोरी निवाड़ के 150 कुटीर उद्योग थे। इन उद्योगों में डेढ़ सौ से अधिक चरखे चलते थे। शहर में द्वारकाधीश मंदिर से आगे का बाजार डोरी बाजार के नाम से जाना जाता था। 1994 से वक्त ने ऐसी करवट बदली कि इन उद्योगों की संख्या घटकर महज 22 रह गई और डोरी बनाने वाले चरखों की संख्या महज 10 तक ही सिमट गई। शासन ने बिजली आपूर्ति पर्याप्त मात्रा में नहीं कराई वहीं कच्चे माल की कीमत भी लगातार बढ़ती रही। ऐसे में लेबर ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए और अन्य कामों में तलाश में इस उद्योग को छोड़कर चले गए। पिछले वर्ष 2011 में गनगन ज्योती और एक अन्य फैक्ट्री भी बंद हो गई। इस तरह डोरी निवाड़ का कारोबार सिमटता चला गया। अब आलम यह कि डोरी बाजार में इस उद्योग से संबंधित महज चार दुकानें ही रह गई हैं। निवाड़ का काम करने वाले कई व्यापारियों ने अपना व्यापार बदल दिया है।

संजीवनी बन रहा सोड़ी धागा
मथुरा (ब्यूरो)। कहते हैं कि डूबते को तिनके का सहारा ही बहुत है ऐसे में सोड़ी धागा ने उस उद्योग को वही सहारा दिया। सोडी धागा दम तोड़ते निवाड़ उद्योग के लिए संजीवनी साबित हो रहा है। विदेशों से आयात किए गए कपड़ों से बनाए जाने वाले धागे को सोडी धागा कहा जाता है। निवाड़ फै क्ट्रियों में इस धागे से सोडी निवाड़ का निर्माण किया जा रहा है जिसकी कीमत बाजार में 40 रुपये किलो पड़ रही है।

प्रदेश सरकार भी जिम्मेदार
मथुरा। डोरी निवाड़ उद्योग के मंत्री सुभाष बाबू का कहना है कि प्रदेश में चल रही धागा मिलों के बंद हो जाने की वजह से डोरी निवाड़ उद्योग की कमर टूट गई। निवाड़ और डोरी में इस्तेमाल होने वाला कॉटन का धागा मिलों के बंद होने से काफी मंहगा हो गया। दूसरे स्टेटों से धागा मंगाया जाता है। कॉटन के धागे से बनी निवाड़ 100 रुपये किलो से अधिक पड़ती है, जो आम आदमी की पहुंच से दूर है। प्रदेश सरकार ने इस प्राचीन उद्योग को आगे बढ़ाने के लिए फैक्ट्री मालिकों को सुविधा नहीं दी। इन उद्योगों को बिजली की आपूर्ति पूरी नहीं मिल रही है। महंगाई के दौर में भरपूर पैसा न मिलने के कारण मजदूर इस काम को छोड़ दूसरे काम में लग जाता है।

मथुरा छोड़ गोहाना में लगाई फैक्ट्री
मथुरा (ब्यूरो)। डोरी निवाड़ उद्योग से जुड़े अमित अग्रवाल अपना कारोबार समेट कर मथुरा से गोहाना (पानीपत) ले गए हैं। उनका कहना है कि मथुरा के मुकाबले गुहाना में काफी अधिक सुविधा हैं। निवाड़ बनाने के लिए वहीं नजदीक पानीपत में चल रही धागा बनाने की फैक्ट्रियों से धागा मिल जाता है। इसके साथ ही वहां लेबर और बिजली की समस्या भी अधिक नहीं है।

बाजार में काफी कम बिक रही है निवाड़
मथुरा (ब्यूरो)। डोरी निवाड़ का कारोबार करने वाले प्रदीप अग्रवाल का कहना है कि अब यह कारोबार काफी सिमट गया है। अब बाजार में केवल चार दुकानें ही इस कारोबार से संबंधित रह गई हैं। मथुरा में निवाड़ की खपत काफी कम है। दूसरे स्टेटों में माल भेज कर व्यापार चल रहा है।

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