सहेजी जाएंगी अज्ञात मृतकों की अस्थियां

Mathura Updated Fri, 19 Oct 2012 12:00 PM IST
दिनेश शर्मा/मथुर।
अज्ञात में मिलने वाले शवों का तीन दिन बाद पुलिस अंतिम संस्कार कर देती है। उसके बाद सब भूल जाते हैं। मृतकों के फोटो और कपड़ों के आधार पर यदि शिनाख्त हो भी जाती है तो परिजनों के दामन में अपनों को खोने के गम से सिवा कुछ भी नहीं रह जाता। उन्हें मृतक की न मिट्टी नसीब हो पाती है और न ही वो उसके अंतिम संस्कार से जुड़ी क्रियाओं को पूरा कर पाते हैं। हिंदू धर्म में मृतक के अस्थि विजर्सन की पौराणिक काल से परंपरा चली आ रही है। लावारिस लाश के मामले में इस परंपरा का निर्वाह भी नहीं हो पाता। सेवार्थ संस्थान ने एक नई पहल की है। जिसमें लावारिस शवों का अस्थि कलश संस्था ने एक साल तक सहेजकर रखने का जिम्मा उठाया है। उसकी यह पहल सराहनीय है।

अपनों से बिछड़ने का गम यकीनी तौर पर वही बता सकते हैं जिनके कलेजे के टुकड़े, भाई, बहन, पति, पत्नी, मां, पिता या अन्य करीबी का अरसे से कोई पता नहीं चल सका। अब ब्रज में अज्ञात शवों के कपड़े व अस्थियां सुरक्षित रखने का जिम्मा सेवार्थ संस्थान ने संभाला है। अब अज्ञात शवों की अस्थियां इकट्ठी करने के साथ ही यह संस्थान उस शव के बारे में मुकम्मल जानकारी हासिल कर ऑनलाइन कर देगा। ऐसे में एक क्लिक पर अज्ञात शवों की तस्वीर कंप्यूटर की स्क्रीन पर हाजिर रहेगी।
मथुरा जनपद में शायद ही कोई दिन हो जब कुछ अज्ञात शव न मिलते हों। इनमें ज्यादातर संख्या बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं की रहती है। पुलिस उनका अज्ञात में पोस्टमार्टम कराने के बाद उनके फोटो कराकर कार्य की इतिश्री कर लेती है लेकिन अब संस्थान के समाजसेवी अज्ञात मृतकों की अस्थियां एक साल तक सुरक्षित रखने व मृतकों के फोटो ऑनलाइन करने व उनकी एक फोटो एलबम बनाकर सहेजने में जुटे हैं।

फोटो और अस्थि कलश पर रहेगा नंबर
इस व्यवस्था में हर अज्ञात मृतक की फोटो पर नंबर डालकर शव का अंतिम संस्कार कराया जाएगा। इसके बाद फोटो वाला नंबर ही अस्थि कलश पर दर्ज कर दिया जाएगा। अब तक संस्था के लोग 70 से अधिक अज्ञात लोगों की अस्थियां व कपड़े सहेज चुके हैं। दो दर्जन से अधिक अज्ञात मृतकों के फोटो एलबम में लगाए जा चुके हैं।

23 से शुरू होगी वेबसाइट
संस्थान के अजय अग्रवाल व महेश कुमार अग्रवाल ने बताया कि 23 अक्तूबर को एसएसपी एन पद्मजा इसका शुभारंभ करेंगी। अज्ञात मृतकों की पहचान के लिए नया सॉफ्टवेयर बनाया गया है। इसे ऑनलाइन कर मृतकों के कपड़े, शव मिलने का स्थान, शरीर की लंबाई चौड़ाई, हुलिया आदि पूरा विवरण अपलोड किया जा रहा है।

संस्थान ने बनवाया था आधुनिक पोस्टमार्टम गृह
जिले के पोस्टमार्टम हाउस को अत्याधुनिक रूप भी सेवार्थ संस्थान ने ही दिया है। अभी हाल ही में 60 लाख की लागत से डीप फ्रीजर वाले इस पोस्टमार्टम गृह को बनवाया गया है।

काश! पहले होती ऐसी व्यवस्था
मथुरा। थाना मगोर्रा के गांव पालीखेड़ा निवासी श्यामकिशोर एलआईसी एजेंट थे। वे 19 सितंबर को आगरा अपने बहनोई अशोक कुमार निवासी कैंट से मिलने गए थे। अशोक ने उन्हें मथुरा जाने को बस में बिठा दिया था। वे मथुरा नहीं पहुंचे और पुलिस ने उनका शव सिकंदरा थाना क्षेत्र के रुनकता में जंगल से लावारिस हालत में बरामद किया था। छह दिन बाद परिवारीजनों ने थाने जाकर कपड़ों के आधार पर उनकी शिनाख्त की थी। पुलिस उनका दो दिन पूर्व ही अंतिम संस्कार कर चुकी थी। इस तरह के न जाने कितने उदाहरण हैं। अब इस तरह के हादसे के शिकार लोगों को एक साल तक मृतक के अस्थि कलश मिल सकेंगे।

‘मृत शरीर के अवशेष व अस्थियों को प्रवाहित जल वाली नदी में प्रवाहित करने की परंपरा है। इसका उल्लेख धर्म सिंधु में मिलता है। इस संस्कार से मृत आत्मा को शांति मिलती है। समाजसेवी अस्थि कलश में गंगाजल डालकर अस्थियों को सुरक्षित रख सकते हैं’
नवीन नागर
अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासंघ के महामंत्री

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