बज्रनाभ ने कृष्ण की कर्मभूमि को दिया था ब्रज नाम

Mathura Updated Sun, 19 Aug 2012 12:00 PM IST
मथुरा। भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र रहे बज्रनाभ ने श्री कृष्ण की कर्मभूमि और जन्म भूमि को ब्रज नाम दिया था। उन्होेंने धर्म के कमजोर पड़ने पर देवताओं ने ब्रज यात्रा कर धर्म को बढ़ावा दिया था। चारों संप्रदायों के आचार्यों ने सारे तीर्थों की खोज की और ब्रज यात्राऐं कर धर्म को बढ़ावा देने के अनेकों काम किए।
ब्रजयात्रा से जुड़े जानकारों के अनुसार 550 वर्ष पूर्व आचार्य निम्बकाचार्य, बल्लभाचार्य, माधवाचार्य और रुप सनातन गोस्वामी ब्रज में पैदा हुए। इन्होंने सारे तीर्थों की खोज की और ब्रज के तीर्थों को सर्वोपरि माना। चारों आचार्यों ने ब्रज की अनेकों बार पदयात्रा की और ब्रज के महत्व को जाना। तभी से ब्रज यात्राओं का बड़े पैमाने पर उद्धव माना जाता है। पूर्व में ब्रज यात्रा तीन माह में पूरी होती थी, लेकिन अब 40 दिन में पूरी कर ली जाती है। आज भी हर संप्रदाय के संत, महंत, गोस्वामी और मठ मंदिरों के मठाधीश अपने अपने हिसाब से ब्रज यात्राएं निकालते रहे हैं। वर्तमान में 40 से अधिक तक ब्रज यात्राएं निकाली जाती हैं। इनमें एक हजार से लेकर 10 हजार तक श्रद्धालु ब्रज के इतिहास और कृष्ण की प्यारी जन्म भूमि, क्रीड़ा भूमि और किए गए क्रियाकलापों से परिचय पाते हैं।
ब्रज के 16 महादेव
गोकुलेश्वर, चिंतेश्वर, गोपेश्वर, उतलेश्वर, चंद्रेश्वर, चकलेश्वर, गोकर्णेश्वर, चक्रेश्वर, आशेश्वर, रंगेश्वर, नंदीश्वर, लंकेश्वर, पिपलेश्वर, रामेश्वर, भूतेश्वर, केदारनाथ बूढ़ाबाबू
ब्रज की 11 शिला
सिंदूरी शिला, दंडवती शिला, कज्जनी शिला, स्नान शिला, चित्र विचित्र शिला, बाजनी शिला, सुंदर शिला, खिसलनी शिला, शृंगार शिला, माणेक शिला, सुगंध शिला,

ब्रज के 33 चबूतरा
वृंदावन में पांच चबूतरा, कामबन, नंदगांव में तीन, करहला में दो, दानगढ़, मानगढ़, बिलासगढ़, सांकरीखोर, गहवरवन, पिसावा कदमखंडी में, जांब, कोकिलावन में तीन, ऊंचागांव, सुनहरा कदमखंडी में, गोविंद स्वामी कदमखंडी में तीन, संकेत, गिरराज जी, चंद्रसरोवर, विलछुआ कुंड

ब्रज में 12 बड़ बृक्ष
अक्षय, शृंगार, श्याम, जॉब, झूलन, संकेत, विलास, पारासौली, वंशी, रासौली, पीलीपोखर, भांडीरवन

ब्रज के छह कदंब
राज कदंब, ऐंठो कदंब, पखावज कदंब, टेढ़ो कदंब, टेरकदंब, दोना कदंब।

ब्रज के 13 कूप
लक्ष्मी कूप, इंद्रकूप, ललिता, कर्णवेध, सप्त समुद्र कूप, कृष्ण कूप, नंद कूप, कुब्जा कूप, भांडीरकूप, चंद्र कूप, गोपकूप, प्रेत कूप, त्रिवेणी कूप

ब्रज के 12 कुंज
पुष्प बिहारी कुंज, फल कुंज, रस कुंज, मधु कुंज, गोकुंज, द्वार कुंज, नव कुंज, शशी कुंज, प्रेम कुंज, शिद्ध कुंज, लक्ष्मी कुंज, तुलसी कुंज

ब्रज के सात समुद्र
ध्रुव सागर, गोपाल, कनक सागर, गोप सागर, बैकुंठ सागर, लक्ष्मी सागर, क्षीर सागर

ब्रज के 40 बिहारी जी
अंजन बिहारी, अंकुर बिहारी, उद्धव बिहारी, कोकिला बिहारी, कुंजबिहारी, किलोल बिहारी, गोविंद बिहारी, चिंताहरण बिहारी, चंद्र बिहारी, चतुर बिहारी, तृष्णावर्त बिहारी, दानबिहारी, दावानल बिहारी, पूतना बिहारी, नवल बिहारी, प्रेम बिहारी, पिता बिहारी, बांके बिहारी, बहुला बिहारी, बृहम्मांड बिहारी, छैल बिहारी, मथरोड बिहारी, मानबिहारी, मोर बिहारी, रास बिहारी, रसिक बिहारी, रमण बिहारी, ललित बिहारी, विचित्र बिहारी, ब्रज बिहारी, बनबिहारी, वृद्ध बिहारी, वेदबिहारी, संकेत बिहारी, शाक बिहारी, श्री बिहारी, शृंगार बिहार, सत्यनारायण बिहारी, शांतनु बिहारी।

ब्रज में हैं 12 अधिवन जहां कृष्ण को विभिन्न नामों से जाना जाता है।
मथुरा में परब्रह्म, राधाकुंड में राधाबल्लभ, नंदगांव में यशोदानंदन, दानगढ़ में नवल किशोर, ललित ग्राम में ब्रज किशोर, ब्रषभानपुर में राधा कृष्ण, गोकुल में गोकुलेंनदु, बल्देव में कामधेनु, गोवर्धन में गोवर्धन नाथ जी, जाब वट में ब्रजवर, वृंदावन में युगल किशोर, संकेतवन में राधारमण जी।

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