माखन मिश्री कौ भोग लगे, तीन लोक जोत जगे...

Mathura Updated Thu, 09 Aug 2012 12:00 PM IST
बल्देव (मथुरा)। माखन मिश्री कौ भोग लगे, तीन लोक जोत जगे...। यहां दाऊजी की कृपा बरसती है लेकिन श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के उल्लास के बीच यहां की मिश्री उदास है। तांसे सूने पड़े हैं। दुनिया भर से यहां आने वाले दाऊजी की कृपा पाते हैं। मिश्री का भोग लगता है लेकिन अब श्रद्धालुओं के मुंह में बलदेव की नहीं बल्कि जयपुर की मिश्री रस घोल रही है। कान्हा के जन्मोत्सव के बावजूद यहां हालात इतने विकट हो गए हैं कि अब मिश्री का सिर्फ एक कारखाना बचा है, जो परिस्थियों की तलवार पर चल रहा है।
माखन सौं रखत हेत, नित्य प्रति चसक लेत- मिश्री के डेले की...। मिश्री-माखन की जुगलबंदी और इसका आनंद अद्भुत है। दाऊजी के दर्शन को आने वाले अपार श्रद्धालु यहां की मिश्री संग ले जाते हैं। यही वजह रही है कि यहां की मिश्री का दुनिया भर में नाम हो गया। लेकिन परंपरागत निर्माण की प्रक्रिया और चीनी के बढ़ते दाम ने मिश्री के कारखानों को मौत के द्वार पहुंचा दिया। गली-गली उठता धुआं अब गायब है। सारे बलदेव में सिर्फ पप्पू बोहरे का कारखाना बलदेव की मिश्री का आनंद दे रहा है। यहां 40 रुपये बोरी के हिसाब से मजदूरी पाने वाले राजकुमार 10 बरस से मिश्री निर्माण में लगे हैं।
कारखाना मालिक पप्पू को डर है कि कहीं ब्रजराज की मिश्री खत्म न हो जाए। यहां की मिश्री का रस सिर्फ उन्हीं के कारखाने की बदौलत कायम है। पप्पू बौहरे कहते हैं कि मिश्री के निर्माण में लागत बहुत अधिक आती है जबकि जयपुर में बड़े कारखाने हैं जिनकी वजह से यहां का उद्योग खत्म होता जा रहा है। दाऊजी के मंदिर के आसपास 55 से 65 रुपये किलो के मूल्य हर दुकान पर अलग-अलग किस्म की मिश्री उपलब्ध है। आते-जाते श्रद्धालुओं के हाथ में मिश्री है। लेकिन बलदेव की मिश्री की वह बहार नहीं है जो पहले हुआ करती थी।

लकड़ी 500 में, तूरी 200 में...
बलदेव में परंपरागत मिश्री बनती है जो अत्यंत स्वादिष्ट होती है। लेकिन लागत अधिक है। भट्ठी में यहां 500 से छह सौ रुपये की कीमत वाली लकड़ी का इस्तेमाल होता है। जबकि जयपुर, राजस्थान में तूरी (लाही की डंठल) का इस्तेमाल होता है जो 200 रुपये कुंतल मिल जाती है। यह बड़ी वजह है जो यहां के कारखानों को खत्म करती गई।

धागे वाली मिश्री अनमोल....
ब्रजराज के सानिध्य में बनने वाली मिश्री का स्वाद निराला है। यहां मिश्री बनाने के बर्तन तांस में बांस की फंटी रखकर धागे पिरोए जाते हैं। इसके बाद इसमें चीनी का घोल डाला जाता है। धागे से चिपकर निकली मिश्री अनमोल होती है और इसका स्वाद सबसे अच्छा माना जाता है। तैयार मिश्री धागे वाली मिश्री, पापड़ी और चूरा (छोटे दाने) के नाम से जानी जाती है।

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