‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले...’

Mainpuri Updated Wed, 22 Jan 2014 05:42 AM IST
मैनपुरी/बेवर। देश को आजादी भले ही 15 अगस्त 1947 को मिली हो लेकिन बेवर के क्रांतिकारियों ने बेवर को 14 अगस्त 1942 को एक दिन के लिए स्वतंत्र करा लिया था। 15 अगस्त को अंग्रेजी पुलिस और सेना द्वारा क्रांतिकारियों पर की गई गोलीबारी में एक छात्र सहित तीन शहीद हो गए थे। बेवर के इन अमर शहीदों की स्मृति में प्रति वर्ष नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती 23 जनवरी से शहीद मेला का आयोजन किया जाता है। हालांकि प्रशासन द्वारा अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने से मेले की रौनक कम होती जा रही है लेकिन फिर भी शहीद मेले में क्षेत्र के हजारों लोग शिरकत करते हैं।
अगस्त 1942 की राष्ट्रीय क्रांति में महात्मा गांधी द्वारा करो या मरो और अंग्रेजों भारत छोड़ो के आह्वान पर बेवर क्षेत्र की जनता आजादी की लड़ाई में दीवानी होकर उमड़ पड़ी थी। 14 अगस्त 1942 को बेवर थाने पर कब्जा कर तिरंगा फहरा दिया गया। एक दिन के लिए बेवर अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो गया। 15 अगस्त को बाहर से आई अंग्रेजी पुलिस और सेना ने बेवर थाने पर मौजूद क्रांतिकारियों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। अंग्रेजी पुलिस और सेना का मुकाबला करते हुए छात्र कृष्ण कुमार और सीताराम गुप्ता तथा जमुना प्रसाद त्रिपाठी सीनों पर गोलियां खाकर शहीद हो गए।
बेवर में शहीदों के बलिदान स्थल पर वर्ष 1948 से 15 अगस्त को बलिदान दिवस मनाने का सिलसिला शुरू हो गया। 1972 से 15 अगस्त से तीन दिवसीय शहीद मेले का आयोजन शुरू हुआ। तीन वर्ष तक 15 अगस्त से ही मेला शुरू किया गया लेकिन बारिश के व्यवधान के चलते 1975 में 26 से 30 जनवरी तक मेले की अवधि निर्धारित की गई। इसके बाद वर्ष 1986 में 23 जनवरी नेता जी सुभाष चंद्र बोस के जन्म दिन से 30 जनवरी बापू के निर्वाण दिवस तक मेले की अवधि निर्धारित की गई। शहीद मेले को ग्राम्य विकास किसान प्रदर्शनी के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया गया। वर्ष 1992 से मेले की अवधि बढ़ाकर छह फरवरी तक कर दी गई। यह परंपरा निरंतर कायम है।

स्वतंत्रता सेनानी त्रिपाठी की खलेगी कमी
शहीद मेला के संस्थापक एवं स्वतंत्रता सेनानी जगदीश नरायण त्रिपाठी की मेले के दौरान आयोजन से जुड़े लोगों को कमी बेहद खलती है। वह मेले के आयोजन से ऐसे जुड़ते थे जैसे घर में शादी समारोह की तैयारी में जुटा जाता है। राज त्रिपाठी कहते हैं कि उनके बिना मेला सूना-सूना सा लगता है। बेवर क्रांति के अमर शहीद जमुना प्रसाद त्रिपाठी के पुत्र जगदीश नारायण त्रिपाठी भी बेवर क्रांति में शामिल थे और उन्होंने पिता की शहादत अपनी आंखों से देखी थी। उनका निधन 17 दिसंबर 2011 को हो गया था।

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