13 वर्ष में 71 राइस मिलें बंद

Mainpuri Updated Wed, 27 Nov 2013 05:39 AM IST
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मैनपुरी। कभी जिले की पहचान रहा राइस मिल उद्योग अब बंदी की कगार पर है। पिछले 13 सालों में एक-एक कर जिले के 71 राइस मिल बंद हो गए। 13 राइस मिल ऐसे हैं जिनके संचालकों ने समय के साथ मिलों में बदलाव किया और नई तकनीक के आधार पर चावल तैयार कर रहे हैं। राइस मिलों के बंद होने के पीछे का कारण प्रदेश सरकार की गलत नीतियां बताईं जा रही हैं।
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वर्ष 2000 तक जिले की पहचान चावल मिलों से होती थी। मैनपुरी का सैला चावल देश में ही नहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल आदि में अपनी अलग पहचान रखता था। वर्ष 2000 तक जिले की 84 राइस मिलों में करीब छह हजार लोगों को रोजगार मिलता था और अप्रत्यक्ष रूप से करीब दो हजार लोग रोजगार पा रहे थे। राइस मिल बंद होने के बाद कोई ऐसा उद्योग विकसित नहीं हुआ जो लोगों को रोजगार और किसानों को उनकी उपज का वाजिब मूल्य दिला पाता।
राइस मिलर्स आनंद स्वरूप अग्रवाल कहते हैं कि सरकार की गलत नीतियां, सुविधाओं और संसाधनों के अभाव के चलते जिले में औद्योगिक वातावरण नहीं बन पा रहा है। पुराने मिलों में मोटे धान से ही चावल तैयार होता था। अधिकांश मिल मालिक सैला चावल बनाते थे। कच्चा चावल तैयार करने में टूटन अधिक आने और सरकार द्वारा लेवी पर चावल लेने की शर्तों के चलते राइस मिल घाटे में आ गईं और बंद होती चलीं गईं। अब पहले धान से चावल बनाने की नई तकनीक वाली मिलें ही कारगर हैं, लेकिन महंगी मिलें चलाना अब आसान भी नहीं है।
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ऐसे बंद होती गईं राइस मिलें
ऑल इंडिया राइस मिलर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय सह सचिव सीताराम तापड़िया के मुताबिक वर्ष 2000 तक जिले में 84 राइस मिलें थीं। अब 13 रह गई हैं इनमें से भी कुछ बंदी की कगार पर हैं। वर्ष 2002 में सरकार ने सैला चावल की लेवी समाप्त करने और कच्चा चावल लेवी पर लेने की नीति जारी की। सरकार 60 प्रतिशत चावल लेवी पर लेती है और केवल तीन फीसदी डैमेज चावल स्वीकार करती है। जबकि टूटन आठ फीसदी तक आती है। 60 प्रतिशत लेवी की बाध्यता के चलते मिलर्स खुले बाजार में चावल बेच भी नहीं सकते। यही कारण है कि राइस मिल बंदी की कगार पर पहुंच गईं हैं।
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