अपने ही देश में बेगानी है खादी

Mainpuri Updated Tue, 02 Oct 2012 12:00 PM IST
मैनपुरी। अपने ही देश में खादी बेगानी हो रही है। आम कपड़ों से महंगी और चमक-दमक नहीं होने के चलते लोगों का रुझान खादी के प्रति कम ही है। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को छोड़ दें तो आम लोग खादी के वस्त्र पहनना पसंद नहीं करते। यह बात अलग है कि गांधी जयंती के बाद खादी के वस्त्रों पर छूट दिए जाने पर खादी की बिक्री में कुछ इजाफा हो जाता है। युवाओं का कहना है कि खादी के वस्त्र आज के परिवेश से मेल नहीं खाते और आम कपड़ों से महंगे भी हैं।
एक जमाना था जब विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर देश में निर्मित खादी के वस्त्र पहने जाते थे। आजादी के बाद धीरे-धीरे खादी के प्रति लोगों को रुझान कम होता चला गया। आज हालात यह हैं कि खादी आश्रमों पर पूरे दिन में चार-छह ग्राहक ही नजर आते हैं। खादी आश्रम के प्रबंधक शशिभूषण तिवारी का कहना था कि पिछले पांच साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो खादी की बिक्री में 20-25 फीसदी की कमी आई है। सर्दियों के दिनों में रजाई, कंबल की बिक्री छूट के चलते बढ़ जाती है। खादी सिल्क के अलावा पैंट और शर्ट के लिए भी खादी के अच्छे कपड़े बनाए जा रहे हैं। फिर भी खादी के वस्त्रों की बिक्री में अपेक्षित बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है।
अवधेश कुमार का कहना है कि खादी के वस्त्र पहनने में आरामदायक हैं, लेकिन आम कपड़ों की अपेक्षा महंगे हैं। उन्हें खरीदना मुश्किल होता है। अनुभव ने कहा कि खादी के कपड़े आज के परिवेश से मेल नहीं खाते। खादी के कपड़ों में साइनिंग नहीं है। 80 वर्षीय पूर्व प्रधानाध्यापक गंगाराम मिश्रा का कहना था कि खादी के कपड़े शरीर के लिए बेहद आरामदायक हैं। ऐसा नहीं कि खादी के कपड़े अधिक महंगे हैं। साधारण खादी और आम कपड़े के दामों में कोई खास अंतर नहीं है। यह बात अलग है कि आज कल लोग खादी पहनने में शर्म महसूस करने लगे हैं।

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