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एसडीएम को आदेश लेना पड़ा वापस

Mainpuri Updated Sat, 25 Aug 2012 12:00 PM IST
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किशनी। थाना क्षेत्र के ग्राम दाऊदपुर के शंकर मंदिर की 18 बीघा भूमि का विवाद गहरा गया है। वारिस भी संदेह के दायरे में है। कथित वारिस के पक्ष में एसडीएम को अपना ही आदेश वापस लेना पड़ा। फिलहाल मंदिर भूमि की बिक्री पर रोक लगा दी गई है।
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ग्राम दाऊदपुर में सेना के सेवानिवृत्त सूबेदार सुरेश चंद्र दुबे ने शंकर (भोले) मंदिर को छह नवंबर 2008 को अपनी 18 बीघा भूमि मंदिर के नाम रजिस्टर्ड वसीयत कर दी थी। तीन मई 2012 को उनका निधन हो गया। आरोप है कि उनके निधन के बाद कुसमरा कसबा निवासी प्रीती पत्नी विशाल गुप्ता ने पांच मई को लेखपाल से मिलीभगत करके खुद को सुरेश चंद्र का वारिस अभिलेखों में अंकित करा लिया। प्रधान और गांव वालों को जानकारी होने पर हड़कंप मच गया। उन्होंने सात मई 2012 को लेखपाल को दोषी ठहराते हुए एसडीएम से शिकायत की। आठ मई को तहसीलदार ने जांच की। नौ मई को उन्होंने अपनी रिपोर्ट एसडीएम को पेश की। इसी के साथ बिक्री पर रोक लगा दी गई। यह मामला तहसीलदार के कोर्ट में शुरू हो गया। जो आज भी विचाराधीन है।
इस बीच कुछ दिनों पूर्व प्रीती गुप्ता ने एसडीएम भोगांव वीके अग्रवाल को मूल तथ्यों को छिपाते हुए पत्र देकर कब्जे की मांग की। इस पर एसडीएम ने एसओ किशनी को कब्जा दिलाने के आदेश दे दिए। जानकारी होने पर मंदिर के सर्वराकार (देखरेख करने वाला) अनिल कुमार और गांव वाले एकत्रित होकर एसडीएम के पास पहुंचे और वास्तविक स्थिति से अवगत कराया। एसडीएम अग्रवाल ने बताया कि जानकारी के अभाव में कब्जे का आदेश कर दिया गया था। इस आदेश को वापस ले लिया गया है। नए आदेश के तहत तहसीलदार कोर्ट में मामला नहीं निपटने तक मंदिर की भूमि की बिक्री नहीं की जा सकती। मंदिर के नाम भूमि करने वाले सुरेश चंद्र दुबे ब्राह्मण जाति से थे। उनकी पुत्री के रूप में वारिस होने का दावा करने वाली प्रीती, वैश्य समुदाय से हैं। दोनों की जातियां अलग होने की वजह से प्रीती गुप्ता के वारिस होने पर भी संशय की स्थिति बनी हुई है। सुरेश चंद्र ने मंदिर के नाम की गई वसीयत में भी अपनी किसी पुत्री का उल्लेख नहीं किया है। ग्रामीण प्रेम सिंह, सुभाष चंद्र, निशू दुबे, विजेंद्र कुमार, शंकर सिंह, चंद्रप्रकाश, अनुज, राम किशोर, सुनील, सूरज सिंह, अमरीश, मोहित सहित 50 से अधिक लोगों ने इस मामले की भी अफसरों से जांच की मांग की है। मंदिर के नाम भूमि करने वाले सुरेश चंद्र ब्राह्मण जाति से थे। वसीयत में उन्होंने अपनी किसी पुत्री के होने का उल्लेख नहीं किया। फिर भी क्षेत्रीय लेखपाल ने सरकारी अभिलेखों में प्रीती गुप्ता को उनका वारिस अंकित कर दिया। तहसीलदार ने भी अपनी जांच रिपोर्ट में क्षेत्रीय लेखपाल को दोषी माना है। फिर भी लेखपाल के खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। वह अभी भी उसी क्षेत्र में तैनात है। क्षेत्र के लोगों ने कार्रवाई की मांग की है।

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