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विजय प्राप्त करने की याद में मनाया जाता है कजली मेला

Mahoba Updated Wed, 01 Aug 2012 12:00 PM IST
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महोबा। अतीत की वह विलक्षण ऐतिहासिक घटनाएं, जिन्हें इतिहास अपने में संजो लेता है, आने वाली पीढ़ियाें को विरासत में मिल जाया करती हैं लेकिन कुछ विलक्षण घटनाएं ऐसी भी होती है, जिन्हें परिस्थितिजन्य कारणाें से इतिहास की लिपि विस्मृत कर देती हैं और वे हमेशा के लिए काल की अंधेरी सुरंगाें में गुम हो जाया करती हैं।
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उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के महोबा नगर की एक ऐसी ही विलक्षण घटना है, जो इतिहास के पन्नाें में दर्ज होने से तो रह गई, लेकिन लोक मानस ने उसे सदैव के लिए अमर कर दिया। सन् 1182 ई. की श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) को कीरत सागर के विशाल तट पर दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान और यहां के शासक परमर्दिदेव (राजा परमाल) के वीर सेना नायकाें के बीच हुए युद्ध में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान की पराजय एक विलक्षण घटना थी। जिसे इतिहास के पन्नाें में तो जगह नहीं मिल सकी, किंतु लोक मानस ने उसे आत्मसात कर अमर बना दिया। चंदेल शासक की विलक्षण विजय को उल्लास पूर्वक अराध्य की स्मृतियाें को चिर स्थाई रखने के लिए 831 सालाें से लाखाें नर नारी प्रति वर्ष उत्तर भारत के प्रसिद्ध ऐतिहासिक कजली मेले में कीरत सागर केे तट पर एकत्र होकर भादाें मास की परीवा को युद्ध में मिली विजय का उल्लास और दूसरे दिन सिद्ध महर्षि गोरखनाथ की तप स्थली गोरखागिरि पर महादेव की तांडवलीन विशाल ग्रेनाइट प्रतिमा के सम्मुख शासक द्वारा किए गए आभार समारोह की पुनरावृत्ति के लिए कजली पर्व का महायज्ञ पीढ़ी दर पीढ़ी करते आ रहे हैं। बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलाें में आज भी रक्षाबंधन का पर्व पूर्णिमा के दिन न मनाकर भादाें माह की परीवा को ही मनाए जाने की परंपरा चली आ रही है।
युद्धकाल की तमाम घटनाआें और वर्तमान के ज्वलंत सवालाें पर जागरूक करती शिक्षाप्रद भव्य झांकियाें की कतारें हाथी, घोड़ा, रानी चंद्रावलि का डोला, महारानी मल्हना का डोला और आल्हा ऊदल की सवारियां लोक संस्कृति के कलाकाराें की टोलियाें से सुसज्जित शोभायात्रा में नजर आती हैं। वहीं शोभायात्रा में सबसे पीछे भारी भीड़ के बीच महिलाआें द्वारा भुजरियाें का विसर्जन कर अतीत की ऐतिहासिक स्मृतियाें को याद किया जाता है। कजली महोत्सव से शुरू होने वाला यह उत्तर भारत का मशहूर मेला अब सात दिनाें तक चलता है। मेले में लोक संस्कृति, बुंदेली विधाआें, बुंदेली गीत और आल्हा गायन की एक सप्ताह तक धूम रहती है लेकिन आज तक इस प्रसिद्ध मेले को राष्ट्रीय मेले का दर्जा न मिलने से बुंदेलखंड वासियाें को खासा मलाल भी है।

इनसेट -------------------
मेहमान नवाजी के लिए जाना जाता है महोत्सव नगर
महोबा। उत्तर भारत के मशहूर कजली मेले में आने वाले लोगाें की जमकर मेहमाननवाजी की जाती है। यही वजह है कि इस महोत्सव के मौके पर हर घर पर मेहमान नजर आते हैं। मेले के समय हर घर के दरवाजाें पर चारपाई और तख्त पड़े रहते हैं जहां पर मेहमानाें के साथ घर के लोग भी खुली हवा के बीच लेटते हैं और देर रात तक आल्हा ऊदल की कहानियां एक दूसरे को सुनाते हैं।

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