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सोलह वर्ष बाद भी नहीं निपटी चकबंदी प्रक्रिया

Mahoba Updated Sun, 01 Jul 2012 12:00 PM IST
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श्रीनगर (महोबा)। वर्ष 1996 से क्ष्ेात्र में चल रही चकबंदी प्रक्रिया पूरी न होने से किसानों के चकों का आवंटन नहीं हो पा रहा है। इससे पूरे क्षेत्र की चकबंदी प्रक्रिया आपसी गुटबाजी में फंसकर रह गई है। साथ ही विभाग भी चकबंदी प्रक्रिया को जल्द निस्तारण के मूड में दिखाई नहीं दे रहा है। चकबंदी की प्रक्रिया से नाराज कृषक आंदोलन का मन बना रहे हैं।
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श्रीनगर में शासन द्वारा 1996 में चकबंदी का गजट किया गया था तब से तकरीबन 16 गुजर चुके हैं लेकिन चकबंदी अधिकारी इस प्रक्रिया को निस्तारित करने में नाकाम साबित हो रहे हैं। 16 वर्षों में सिर्फ सहायक अधिकारी स्तर पर ही चकबंदी प्रक्रिया निपट पाई है। वहां वादों के निस्तारण की कार्रवाई लंबे समय से चल रही है। जब काश्तकारों के खेतों की पैमाइश शुरू की गई तो चकों में गड़बड़ी की शिकायत सामने आई। इससे किसान आक्रोशित हो गए और चकों के नाप जोख का सिलसिला थम कर रह गया। हर काश्तकार पक्षपात का आरोप चकबंदी अधिकारियों पर लगा रहा है। किसान चकबंदी द्वारा नाप जोख कर दिए जाने वाले चकों को लेने को तैयार नहीं है। इससे अधिकारियों को पसीने छूृटने लगे हैं। जितना काम विभाग ने 16 वर्षो में किया, वह पुरानी स्थिति मेें ही आकर रुक गया है।
चकबंदी विभाग के अधिकारी किसानों पर गुटबाजी का आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि ग्रामणों की अहं की राजनीति के कारण निस्तारण में विलंब हो रहा है। काश्तकारों का एक गुट चकबंदी प्रक्रिया रोकने का पक्षधर है तो दूसरा इसे जल्द से जल्द पूरा कराने की मांग कर रहा है। काश्तकार महेेंद्र कुमार, महेशचंद्र, प्रमोद कुमार, पूर्व प्रधान देवी सिंह, भवानी यादव, डीआर कुशवाहा, जय प्रकाश आदि का कहना है कि विभागीय अधिकारियों ने चकों के आवंटन में व्यापक पैमाने पर गड़गबड़ी की है। शुरुआती दौर पर मौके पर जाकर चकों की तरमीन नहीं कराया गया है। किसानों के मूल चकों को दूसरे किसानों के नाम दर्ज कर दिया गया। चकरोड, बंधियों को मूल जगह से निकाल दिया गया है जिससे काश्तकार परेशान है। वहीं प्रक्रिया को जारी रखने के लिए पूर्व प्रधान शिवकुमार राजपूत, अनिल कुमार, राजू सोनी, सेवालाल, वीरेंद्र मिश्रा, नरेंद्र गंगेले, रामगोपाल आदि का कहना है कि यदि प्रक्रिया बाधित होती है तो किसानों को बहुत बड़ी हानि होगी। सहायक चकबंदी अधिकारी एसके दोहरे का कहना है कि जिलाधिकारी के निर्देश पर उनकी टीम गांव गई थी और राय जानने की कोशिश की गई। जिसमें अधिकांश लोग प्रक्रिया रोक देने के पक्षधर दिखाई दिए। कृषकाें का कहना है कि अगर नियमानुसार चकबंदी प्रक्रिया में चक आवंटन की कार्रवाई समय पर न कराई गई तो सामूहिक रूप से आंदोलन करना मजबूरी होगी।

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