बदकिस्मती ने छीन ली परिवार की खुशियां

Maharajganj Updated Fri, 22 Nov 2013 05:41 AM IST
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महराजगंज। कभी लोगों के कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला दुर्गेश अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहा रहा है। उसकी सेना में जाने की चाहत अधूरी रह गई। एक ऐसा हादसा हुआ कि वह विकलांग हो गया। बूढ़े-मां बाप को अपनी नहीं बेटे की चिंता सता रही है कि उनकी मौत के बाद उसका सहारा कौन बनेगा।
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फरेन्दा क्षेत्र के फ रेन्दाखुर्द के टोला रगड़गंज निवासी दुर्गेश जायसवाल ने सपने संजोया था कि सेना में जाकर देश सेवा तो करेगा ही बूढ़े-मां बाप का सहारा भी बनेगा। एक झटके में उसका सपना चकनाचूर हो गया।
वर्ष 2009 में फरेन्दा स्थित मोतीराम द्विवेदी जनता इंटर कॉलेज में वह 12वीं में पढ़ रहा था। पढ़ाई के दौरान ही उसकी सेना में भर्ती होने की इच्छा जागृति हुई। वह रोज भोर में दौड़ लगाने के लिए घर से निकल जाता था। लेकिन सात फरवरी 2009 का दिन उसके लिए मनहूस साबित हुआ। रोज की तरह उस दिन भी वह दौड़ लगाने के लिए निकला था। रास्ते में हाईटेंशन तार गिरा था। वह उसे देख नहीं पाया और उसकी चपेट में आ गया। इससे वह गंभीर रूप से झुलस गया। गरीब मां-बाप के पास जो कुछ भी था वह इलाज में खर्च कर दिए। जितनी खेती थी उसको बेच करके उसका इलाज कराए। ंतत: डाक्टरों को उसके दोनों हाथ और पैर काटने पड़ा। इससे वह अपाहिज हो गया।
मां-बाप का टूट गया सपना
बूढ़े मां-बाप को अपने इकलौते पुत्र पर नाज था कि वह बुढ़ापा में उनका सहारा बनेगा लेकिन ईश्वर को यही मंजूर था कि वे अपनी इकलौते संतान का खुद सहारा बनें। दुर्गेश अपने दोनों हाथ-पैर गंवाने के बाद किसी तरह जीवनयापन करता है। जनप्रतिनिधियों से गुहार करने के बाद भी मात्र आश्वासन मिला। 70 वर्षीय पिता हरीराम जायसवाल का कहना है कि मुझे चिंता सता रही है कि मेरे मरने के बाद मेरे बेटे का सहारा कौन बनेगा और उसकी देखभाल कैसे होगी। बेहतर होता कि वह उसी समय मर गया होता। इतना कहकर बूढ़ा बाप फफक कर रो पड़ा। 68 वर्षीय माता शान्ति देवी का कहना है कि मेरे इकलौते पुत्र के दोनों हाथ-पैर छीनकर ईश्वर ने परिवार की कमर तोड़ दी। घर में कोई कमाने वाला नहीं है । घर में एक अन्त्योदय कार्ड है। जिसका राशन मिलने के बाद घर में चूल्हा जलता है।

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