कण- कण में इतिहास पर सैलानी नदारद

Lalitpur Updated Mon, 20 Jan 2014 05:51 AM IST
ललितपुर। विपन्न कहे जाने वाले बुंदेलखंड स्थित ललितपुर जनपद की धरा के कण- कण में इतिहास विद्यमान है। अनगिनत पुरातात्विक स्थलों संग कल- कल बहती बेतवा के साथ बांधों में सुकून देने वाला जल और जंगलों की हरियाली लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए काफी है। लेकिन, आवागमन के साधनों का अभाव और प्रचार प्रसार की कमी इस जिले को पर्यटन स्थली के रूप में विकसित करने में बाधा बनी हुई है।
आमतौर पर विदेशी सैलानी ओरछा और खजुराहो को देखकर वापस लौट जाते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले सैलानी भी ओरछा और खजुराहो तक ही सीमित हैं। जबकि, अगर पर्यटन की दृष्टिकोण से ललितपुर जनपद को देखा जाए तो यहां हर तरफ पुरा इतिहास बिखरा पड़ा है। राज्य पुरातत्व विभाग के 24 मोनोमेंट मौजूद हैं। बालाबेहट किला, भगवान कृष्ण की लीलाओं के स्थलों में से एक रणछोर मंदिर, गोंडवानी सौंरई, सौंरई का किला, अति प्राचीन जैन मंदिर सौंजना, प्राचीन मंदिर सीरोन जी, सतगता की बावड़ी सहित विभिन्न पुरातात्विक स्थल इतिहास से साक्षात्कार कराते हैं। अंग्रेजों से लड़ाई के दौरान उक्त किलों में गुप्त रणीनीति बनायी जाती थी। सिर्फ इतना ही नहीं इस जनपद में भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीन 75 पुरातात्विक स्थल अपने में सैकड़ों वर्ष पुराना इतिहास समेटे हुए हैं।
ढाई हजार वर्ष पुराना देवगढ़ स्थित दशावतार मंदिर गुप्तकालीन धरोहरों में से एक है। इस मंदिर की दीवार पर नर नारायण की प्रतिमा, शेष सैया पर लेटे भगवान विष्णु के पैर दबाते हुए लक्ष्मीजी, गज ग्राह की प्रतिमा ऐतिहासिक धार्मिक कथाओं का प्रमुख हिस्सा है। यही नहीं बेतवा नदी के किनारे नृवराह मंदिर भी गुप्त कालीन बताया जाता है। इस मंदिर की आदमकद प्रतिमा में भगवान का सूकर अवतार दर्शाया गया है। पृथ्वी को पाताल से मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु ने यह अवतार लिया था। ऐतिहासिक कथाओं में इसका भी वर्णन सुनने को मिलता है। देवगढ़, झूमरनाथ, चांदपुर जहाजपुर, दूधई, पांडुवन स्थित मंदिर तथा आदिकालीन प्रतिमाएं, पाली स्थित नीलकंठेश्वर व पहाड़ पर उकेरी गई नृसिंह प्रतिमा, धौर्रा स्थित सुम्मेर गिरी पर्वत पर दर्जनों मूर्तियां विद्यमान हैं। इसके अलावा भी जनपद में तमाम पुरातात्विक स्थल इतिहास को समेटे हुए हैं। इन मूर्तियों का केश विन्यास, आभूषण इनकी प्राचीनता को प्रदर्शित करती है। सिर्फ इतना ही नहीं ललितपुर जनपद में राजघाट, माताटीला, गोविंद सागर, जामनी, रोहिणी, शहजाद, सजनम बांध है। बारिश के दौरान इन जलाशयों में पानी की हिलोरे किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित करने को काफी हैं। बेतवा नदी में पत्थरों से टकराता पानी की आवाज भला कौन नहीं सुनना चाहेगा? इसके अलावा 74 हजार हेक्टेयर में फैले वन क्षेत्र की हरियाली किसी को भी वशीभूत करने के लिए पर्याप्त है। लेकिन, अफसोसजनक यह है कि जनपद की इन विशेषताओं से लोग अवगत नहीं हैं, जिसकी वजह से सैलानी के कदम इस ओर नहीं बढ़ रहे हैं।

आवागमन के मार्ग हों दुरुस्त
ललितपुर। जानकारों का मानना है कि पुरातात्विक स्थलों तक पहुंचने के मार्ग दुरुस्त होने चाहिए। अभी उक्त स्थलों तक पहुंचने के लिए लोगों को ऊबड़ खाबड़ पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरना पड़ता है। अगर रास्ते सुगम हो जाएं तो यहां सैलानी आसानी से पहुंचने लगेंगे।

व्यापक स्तर पर हो प्रचार
ललितपुर। भारतीय पुरातत्व व राज्य पुरातत्व विभाग के तहत आने वाले पुरातात्विक स्थलों का व्यापक पैमाने पर प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए। प्रत्येक स्थल की विशेषता को बाकायदा आन लाइन किया जाना चाहिए। ताकि देश व विदेश के सैलानी इन ऐतिहासिक स्थलों की विशेषताओं से अवगत हों और इनको देखने के लिए जनपद आएं।

पर्यटन से मिलेगा रोजगार
ललितपुर। जानकारों का मानना है कि ललितपुर जनपद को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए जाने से लोगों को अपने आप रोजगार मिलने लगेगा। अन्य पर्यटन स्थलों की भांति यहां के लोग छोटी- छोटी दुकानों सहित अन्य व्यवसाय संचालित करके अपना जीवकोपार्जन कर सकेंगे।

मूर्तिकला का गढ़ ललितपुर
ललितपुर। ललितपुर जनपद की धरा में मौजूद पत्थर बहुत ही लचीला है। यही वजह है कि यहां मूर्तिकला वर्षों तक मौजूद रही। जानकारों का कहना है कि सैकड़ों वर्ष पहले ललितपुर जनपद से ही देशभर में प्रतिमाएं भेजी जाती थीं।

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