मुफलिसी की जिंदगी बसर कर रहा शहनाई वादक

Lalitpur Updated Thu, 13 Dec 2012 05:30 AM IST
ललितपुर। 71 वर्षीय मशहूर शहनाई वादक मेहंदी हसन जब पुराने दिनों को याद करते हैं तो उनका गला रुंध जाता है, आंखों की नमी उनके आज का दर्द बया करने लगती हैं। जिस कलाकार को राज्य सरकार ने एक नहीं बल्कि दो बार यश भारती पुरस्कार से नवाजा था वह आज मलिन बस्ती में कच्ची झोपड़ी में अपना जीवन बसर कर रहा है। सरकार ही नहीं कद्रदानों की भी उपेक्षा के शिकार मेहंदी हसन दो जून की रोटी के खातिर संघर्ष कर रहे हैं।
एक जमाना था, जब मेहंदी हसन की शहनाई लखनऊ से दिल्ली तक गूंजा करती थी। उस दौर में उन्हें काफी सम्मान और वाहवाही मिली, लेकिन मौजूदा समय में कला की कद्र करने वाले नहीं बचे हैं। शहनाई को विवाह समारोह का प्रतिनिधि वाद्य यंत्र कहे तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। विवाह के निमंत्रण पर भी शहनाई का चित्र छापा जाता है, लेकिन अब शहनाई की तान डीजे की कर्कश आवाज के बीच दबकर रह गई है। शहनाई की तान के जैसा हाल ही जनपद के मशहूर कलाकार मेहंदी हसन का भी है। बांस के पतले डंडे पर टंगा मैला कुचैला कपड़ा इस कलाकार द्वार है और बरसात के कारण ढही मिट्टी की कच्ची दीवारों के बीच बनी झोपड़ी उसका आशियाना, जो छह बेटों के साथ रहने के लायक नहीं है। हालांकि, तीन मजदूर बेटों ने निकाह के बाद अपना आशियाना अलग कर लिया है, जबकि तीन बेटे जाहिद, जाफर एवं जाकिर हाथ ठेला व रिक्शा चलाकर परिवार की गाड़ी खींचने में सहयोग कर रहे हैं। वह जब मजदूरी करके जब घर लौटते हैं तो अम्मी शाहजहां झोपड़ी के बाहर पतेली पर खाना परोस देती है, जिसे खाकर यह परिवार खुले आसमान के नीचे जमीन पर कपड़ा बिछाकर रात गुजारता है। शहनाई वादक व उसके बच्चों की मजदूरी से इतनी कमाई नहीं होती है कि वह कच्ची कुटिया को पक्के मकान में तब्दील कर सकें। अफसोस जनक तो यह है कि दो-दो यश भारती पुरस्कार भी इस शहनाई वादक का जीवन तो नहीं बदल सकीं, लेकिन रात दिन शहनाई की तान छेड़ने के कारण उसे स्वांस व फेंफड़ों का रोगी जरूर बना दिया। वह दो जून की रोटी की खातिर विवाह घरों में आयोजित शादियों में शहनाई बजाने को विवश है।

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