देवोत्थान एकादशी: आज जागेंगे पालनहार

Lalitpur Updated Sat, 24 Nov 2012 12:00 PM IST
ललितपुर। अषाढ़ माह की देवशयनी ग्यारस को क्षीर सागर में सोए पालनहार भगवान विष्णु कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवोत्थान एकादशी) को जागेंगे। इस मंगल अवसर पर घरों व मंदिरों में विराजे भगवान के श्रंगार व पूजन की तैयारियां लोगों ने पूर्ण कर ली हैं।
सनातन धर्म में मान्यता है कि भगवान विष्णु अषाढ़ माह की देवशयनी ग्यारस से चार माह के लिए क्षीरसागर में शयन करते हैं। हिंदू रीति रिवाज के अनुसार इस दौरान विवाह आदि शुभ कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाते। भगवान का यह विश्राम कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष एकादशी (देवोत्थान एकादशी) को पूर्ण होता है। इस शुभ दिन मंदिरों व घरों में विशेष पूजा अर्चना की जाती है। शंख की तेज ध्यनि से भगवान को जगाया जाता है साथ ही उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। शनिवार को पड़ने वाली देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान की आराधना को सनातन धर्म में आस्था रखने वाले लोगों ने विशेष तैयारियां की हैं। विभिन्न टेलरों ने भगवान के लिए विशेष वस्त्र बनाए हैं। संकट मोचन हनुमान जी के लिए उनके चित्र वाला परदा तैयार किया गया, वहीं लड्डू गोपाल के लिए भी आकर्षक पोशाकें बनाई गई हैं। भगवान को अर्पित करने के लिए भक्तों ने आज मूंग, ज्वार भुंटी, गन्ना, मिष्ठान क्रय किया। नगर स्थित राधाकृष्ण मंदिर पुलिस लाइन, जगदीश मंदिर, पंचमुखी मंदिर, बलखंडी मंदिर, तुवन मंदिर, सीतापाठ, चंडी मंदिर, सिद्दन के हनुमान मंदिर, गोकुल घाट मंदिर, रामराजा मंदिर, नृसिंह आदि मंदिरों में देवोत्थान एकादशी की तैयारियां की गई हैं। मंदिर परिसरों में साफ सफाई का काम जोरों पर है।


ब्रह्मा की स्तुति पर जागे भगवान विष्णु: शास्त्री
नेहरू महाविद्यालय के प्राचार्य व संस्कृत विभागध्यक्ष डा. ओमप्रकाश शास्त्री ने बताया कि अषाढ़ मास की एकादशी से भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन करने चले जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि असुर मधुकेटव भगवान ब्रह्मा जी से युद्ध लड़ने चल देता है। बृह्मा जी सहित सभी देवता परेशान हो जाते हैं और वे क्षीर सागर में सो रहे भगवान विष्णु की स्तुति करते हैं। भगवान विष्णु कार्तिक माह की शुक्ल एकादशी को जागते हैं और जिसके बाद वे असुर का अंत करते हैं।


सजी रहीं आकर्षक वस्त्रों से दुकानें
ललितपुर। देवोत्थान ग्यारस पर भगवान को नए वस्त्र पहनाने की परंपरा है। यही कारण है कि बाजार में टेलर मास्टरों ने भी अनेक सजावटी कपड़े तैयार किए। टेलरों का कहना है कि नगर के मंदिरों से आर्डर पहले से ही मिल गए थे। साइज के हिसाब से कपड़े, झंडे व अन्य पोशाकें बनाई गई हैं। भगवान के झंडे, घोड़ा झूमर, पोशाकें, चादर, गद्दा सहित दुर्गा जी, हनुमान जी, सहित सभी देवी देवताओं की पोशाकें बनाईं जा रही हैं। टेलरों ने बताया कि मूर्ति वाले परदे की साल भर मांग बनी रहती है। इसे हाथ से तैयार किया जाता है, जिसमें करीब आठ दिन का समय लगता है। इसमें गोता, जरी, बकरम, लेस आदि को प्रयोग किया जाता है।


बोले भगवान के कपड़े सिलने वाले
जो श्रद्धा से मिलता है ले लेते हैं
सालभर सिर्फ भगवान के कपड़े सिलता हूं। एक से लेकर एक हजार तक रुपये तक के वस्त्र बनाता हूं। श्रद्धालु जो रुपये दे देते हैं, उन्हें भगवान का आर्शीवाद मानकर रख लेता हूं। मैंने दुकान पर आए ग्राहक को कभी पैसे के कारण वापस नहीं लौटाया।
अशोक कुमार नामदेव, टेलर

लोग साल भर भगवान के कपड़े बनवाने आते हैं। इस बार ढोल ग्यारस पर बीस मंदिरों व घरों से आर्डर मिले थे। सभी वस्त्र तैयार किये जा चुके हैं। मूर्तिवाले परदों की खासी मांग रहती है। जिसे आर्डर पर हाथ से तैयार किया जाता है।
राजेंद्र कुमार नामदेव, टेलर


बीस रुपये का बिका एक गन्ना
ललितपुर। देवोत्थान एकादशी पर बाजार में गन्ने की विशेष मांग रही। घंटाघर प्रांगण सहित विभिन्न बाजारों में गन्ने की दुकानें सजी रहीं। बाजारों में बीस रुपये प्रति के हिसाब से गन्ना की बिकवाली हुई।
देवोत्थान एकादशी पर गन्ने का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान को गन्ने के मंडप में बिठाया जाता है और पूजा अर्चना की जाती है।
सनातन धर्म को मानने वाले लोग अपने घरों में 1, 2, 3, 5, 11 गन्नों को पूजा में शामिल करतें हैं। नगर स्थित मंदिरों में भी गन्ने का मंडप बनाकर भगवान की पूजा अर्चना की जाती है। इसके बाद दूसरे दिन गन्ने को श्रद्धालुओं में बांट दिया जाता है। नगर के वर्णी कालेज, घंटाघर, नझाई बाजार गेट, सावरकर चौक आदि स्थानों पर गन्ने की जमकर बिक्री हुई। कुछ दिनों पहले पांच से दस रुपये में बिकने वाला गन्ना त्यौहार आते ही 20 से 25 रुपये में बिका।


शुरू होंगी शादियां
ललितपुर। अषाढ़ माह की देवशयनी ग्यारस को भगवान के विश्राम पर जाने के साथ ही विवाह आदि कार्यक्रम बंद हो जाते हैं। वहीं देवोत्थान एकादशी को भगवान के जागरण करते ही विवाह आदि के शुभ मुहुर्त शुरू हो जाते हैं। यही कारण है कि आज से शहनाई गूंजने लगेगी।

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