मिट्टी के दीपक बनाने को चाक ने पकड़ी रफ्तार

Lalitpur Updated Tue, 30 Oct 2012 12:00 PM IST
ललितपुर। दीपावली पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों के चाक ने गति पकड़ ली है, उन्हें इस बार अच्छी बिक्रीकी उम्मीद है। नगर में स्थित कुम्हारों की बस्ती में उनके परिवार मिट्टी का सामान तैयार करने में व्यस्त हैं।
चौबयाना निवासी घनश्याम प्रजापति, बृजेश, हरीराम, बृजलाल आदि के घरों में मिट्टी के दीपक, मटकी आदि बनाने के लिए माता पिता के साथ उनके बच्चे भी हाथ बंटा रहे हैं। कोई मिट्टी गूंथने में लगा है तो किसी के हाथ चाक पर मिट्टी के बर्तनों को आकार दे रहे हैं। महिलाओं को आवा जलाने व पके हुए बर्तनों को व्यवस्थित रखने का जिम्मा सौंपा गया है। इसके साथ ही महिलाएं रंग बिरंगे रंगों से बर्तनों को सजाने में जुटी हैं। दीपावली पर्व पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं। मिट्टी से निर्मित चार, छह, बारह एवं चौबीस दीपों वाली मिट्टी की ग्वालिन की पूजा की जाती है। मिट्टी की छोटी मटकियों में धान क ी खीलें भरकर उनकी पूजा होती है। नगर के मुहल्ला चौबयाना, खिरकापुरा, गांधीनगर, नईबस्ती, आजादपुरा द्वितीय, नेहरूनगर आदि इलाकों में स्थित कुम्हारों की बस्ती में मिट्टी के सामान तैयार हो रहे हैं।



चाक से बनती हैं कई चीजें
करीब आठ से दस हजार रुपए में आने वाला चाक का पहिया बड़ी मेहनत से पत्थर के कारीगरों द्वारा तैयार किया जाता है। इस पर सारे मिट्टी के बर्तन बनाए जाते हैं। दीपक, घड़ा, मलिया, करवा, गमला, गुल्लक, गगरी, मटकी, नाद, कनारी, ग्वालन, बच्चों की चक्की सहित अन्य उपकरण बनाए जाते हैं। कुम्हारों ने बताया कि चाक का पानी व मिट्टी औषधि का काम करती है। सांप के काटने पर इस मटमैले पानी को लगाने से विष खत्म हो जाता है।
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मिट्टी गढ़ने वालों पर मेहरबान नहीं हैं धन लक्ष्मी!
ललितपुर। मिट्टी गढ़कर उसे आकार देने वालों पर शायद धन लक्ष्मी मेहरबान नहीं है, जिसके चलते अनेक परिवार अपने परंपरागत धंधे से विमुख होते जा रहे हैं। दीपावली पर्व पर मिट्टी का सामान तैयार करना उनके लिए सीजनेबल धंधा बनकर रह गया है। हालात यह है कि यदि वे दूसरा धंधा नहीं करेंगे तो दो जून की रोटी जुटा पाना कठिन हो जाएगा।
मिट्टी के बर्तनों के कारोबार से जुड़े कुम्हारों का कहना है कि दीपावली व गर्मी के सीजन में मिट्टी से निर्मित बर्तनों की मांग जरूर बढ़ जाती है, लेकिन बाद के दिनों में वे मजदूरी करके ही परिवार का पेट पालते हैं। चौबयाना निवासी बृजलाल का कहना है कि दूर से मिट्टी लाना, महंगी लकड़ी खरीदकर दीपक पकाने में जो खर्च आता है, उसके सापेक्ष आमदनी लगातार घटती जा रही है। घर के आठ सदस्य दिन रात मेहनत करके एक दिन में एक सैकड़ा दीपक बना पाते हैं, वहीं दूसरी ओर बाजारों में इलेक्ट्रानिक्स झालरों की चमकदमक के बीच मिट्टी के दीपक की रोशनी धीमी पड़ती जा रही है, जिसके चलते लोग दीपकों का उपयोग महज पूजन के लिए ही करने लगे हैं। इस कारण उन्हें अपनी मेहनत का उचित मेहनताना नहीं मिल रहा। यही कारण है कि मुहल्ले के करीब पंद्रह लोगों ने इस काम को छोड़ दिया है।


सरकार की मदद की दरकार
मिट्टी लाने एवं दिए बनाने से लेकर पकाने में जो खर्च होता है, उसके हिसाब से लाभ नहीं होता है। हम लोग सीजन के बाद अन्य काम करने लगते हैं। इस कला को बचाने के लिए सरकारी मदद दी जानी चाहिए, जिससे हमारी मिट्टी गढ़ने की कला बची रहे।
घनश्याम प्रजापति, चौबयाना


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मजदूरी ही सहारा
हमारे घर में आठ-दस पीढ़ियों से इस धंधे को किया जा रहा है। लेकिन, अब पहले जैसी खरीददारी नहीं होती। अब मिट्टी वाले बर्तन सीजनेबल धंधा बनकर रह गए हैं। दीपावली के अवसर पर पांच-दस हजार की कमाई हो जाती है, बाकी दिनों में परिवार की गाड़ी चलाने के लिए मजदूरी का सहारा लेना पड़ता है।
हरीराम प्रजापति, चौबयाना


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घट रहा लोगों का रुझान
मिट्टी से बने आइटम से लोगों का का रुझान कम हो गया है, जिस हिसाब से इसमें मेहनत और पैसा लगता है उसके सापेक्ष हमें बहुत कम लाभ मिल पाता है। यही कारण है कि हम लोग दीपावली व गर्मियों में ही इस धंधे को करते हैं, बाकी दिनों में अन्य काम करके पेट पालते हैं।
ब्रजेश प्रजापति, चौबयाना
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धंधे से अच्छी है मजदूरी
धंधे में लाभ कम होने के कारण मुहल्ले के 15 लोगों ने धंधा बंद कर दिया है। हम चार पीढ़ियों से पुश्तैनी काम कर रहे थे, लेकिन अब कोई फायदा नहीं पड़ता है। अगले साल धंधे को बदलने की सोच रहे हैं। इस काम से अच्छी तो मजदूरी है, जिसमें दो सौ रुपए प्रतिदिन मिलते हैं।
ब्रजलाल प्रजापति खिरकापुरा

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