सुम्मेरा तालाब: चमत्कारों भरे अतीत से जुड़ी है आस्था

Lalitpur Updated Mon, 24 Sep 2012 12:00 PM IST
ललितपुर। मंदिरों की श्रंखलाओं से घिरा चंदेलकालीन सुम्मेरा तालाब (सुमेरु सरोवर) चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित अन्य तालाबों की तुलना में विशेष महत्व रखता है। इसका अतीत चमत्कारिक किंवदंतियाें से जुड़ा होने के साथ ही सांस्कृतिक, व्यवसायिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। यही वजह है कि इस सरोवर से लोगों की आस्था आज भी जुड़ी है।
सरोवर को राजा सुम्मेर सिंह ने विकसित किया था। उनकी धर्मपत्नी ललिताबाई के नाम पर ही नगर का नाम ललितपुर पड़ा। सुम्मेरा तालाब के घाटों पर स्थित मंदिरों की श्रृंखलाएं जहां शताब्दियोें से सांस्कृतिक व धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रही हैं, वहीं घाटों का उपयोग कभी व्यवसायिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण रहा है। नेहरू महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रो. भगवत नारायण शर्मा के अनुसार प्राचीन काल में ललितपुर नगर गुड़ की प्रमुख मंडी था। व्यवसायी बैलगाड़ियों से राजस्थान की सांभर झील तक गुड़ का निर्यात करते थे, वहां से नमक यहां आता था। व्यापारियों के अत्यधिक आवागमन के कारण सुम्मेरा तालाब के आसपास का क्षेत्र रैन बसेरा के रूप में उपयोग किया जाता था। तालाब पर बने घाटों पर पुरुष व महिलाओं को पृथक स्नान करने की सुविधा थी। कार्तिक मास में महिलाएं प्रात: काल यहां स्नान - ध्यान करती थीं, यह परंपरा आज भी चल रही है। नवरात्रि के अंतिम दिन यहां जवारे विसर्जित होते हैं तथा जलविहार (डोल ग्यारस) के दिन सभी देवालयों के देव नगर भम्रण करते हुए तालाब के घाटों पर स्नान के लिए आते हैं। गणेश चतुर्थी के दिन तालाब में गणेश प्रतिमाएं विसर्जित होती हैं। करवा चौथ पर महिलाएं अपने सुहाग के दीर्घायु की कामना से तालाब में जलते हुए दीपक विसर्जित करती हैं। विवाह के दौरान वर व वधू को बांधे जाने वाले मौर को इसी तालाब में विसर्जित किया जाता है। पितृ पक्ष में पूर्वजों को यहीं पर तर्पण किया जाता है।
कहा जाता है कि राजा सुम्मेर सिंह असाध्य चर्मरोग से ग्रसित हो गए थे। इस पर रानी ने तालाब के औषधियुक्त पानी से उनका स्नान कराया, जिससे वे रोग मुक्त हो गए थे। इसके अलावा सर्पदंश से मरणासन्न हो जाने पर तालाब के पानी से लोगों के भले चंगे होने की चमत्कारिक किंवदंतियां भी जुड़ी हैं।

अब हाथ धोने से भी परहेज
ललितपुर। तालाब का जल कभी चमत्कारिक रहा होगा, पर अब लोग इसमें नहाने से डरते हैं। अतिक्रमण के कारण इसका दायरा सिमट गया है तथा घरों का गंदा पानी आने से तालाब प्रदूषित हो गया है। पूरे तालाब को जलकुंभी ने लील लिया है। उसके गंदे पानी से नहाना तो दूर अब लोग हाथ धोने से भी परहेज करने लगे हैं।

गंगाजल मुहैया कराता है प्रशासन
ललितपुर। कुछ वर्ष पूर्व जलविहार के दिन सुम्मेरा तालाब की गंदगी देख श्रद्धालुओं में आक्रोश फूट पड़ा था। तभी से जलविहार के दिन देवों के स्नान के लिए गंगाजल की व्यवस्था प्रशासन की ओर से की जाने लगी है। हालांकि, तालाब के पानी को स्वच्छ बनाने की दिशा में सार्थक प्रयास नहीं किए गए।

जस के तस हैं हालात
ललितपुर। बुंदेलखंड विकास सेना के आंदोलन एवं महंत अमावस गिरि नागा व चंडी मंदिर पीठाधीश्वर की अगुवाई में संत समाज के आंदोलन के फलस्वरूप सुम्मेरा तालाब के जीर्णोद्धार के लिए शासन से धनराशि अवमुक्त की गई थी। लेकिन, उसके व्यय होने के बाद तालाब के हालात जस के तस बने हुए हैं।

सड़क है दुर्दशाग्रस्त
ललितपुर। सुम्मेरा तालाब को जाने वाला मार्ग दुर्दशा का शिकार है। सड़क पर छोटे- बड़े गड्ढों की भरमार है। बारिश के दौरान उनमें पानी भर जाता है। मौजूदा हालातों में विमानों का निकलना बहुत मुश्किल है। हालांकि नगर पालिका परिषद के अधिकारियों ने मार्ग को दुरुस्त करने के दिशा- निर्देश दे दिए हैं।

वैदिक काल से हो रहा है जलविहार
ललितपुर। मान्यता है कि जलविहार महोत्सव वैदिक काल से मनाया जा रहा है। महोत्सव के दिन श्री रघुनाथ मंदिर से विमानों की शोभायात्रा प्रारंभ होकर रावरपुरा, महावीरपुरा, श्री जगदीश मंदिर व सावरकर चौक होते हुए सुम्मेरा तालाब पहुंचती है। इसमें समस्त मंदिरों के पुजारियों के साथ नागरिक भी शामिल होते हैं। नृसिंह मंदिर प्रांगण में महाआरती के बाद कटरा बाजार में विराजमान श्री गणेश जी झांकी, श्रीजगदीश मंदिर व थानेश्वर मंदिर में आरती होकर सभी विमान देवालयों को प्रस्थान करते हैं। जलविहार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए नेहरू महाविद्यालय के प्राचार्य/ संस्कृत विभागाध्यक्ष डा. ओमप्रकाश शास्त्री ने कहा कि वैदिक काल में वर्षा ऋतु की समाप्ति पर सरोवर, तालाब, नदियां एवं कुएं वर्षा के जल से भर जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं से जुड़ेे लोग भाद्रपद शुक्ल एकादशी जलविहारी (डोल ग्यारस) पर देवों का जलाभिषेक करने के बाद ही सरोवर, तालाब, नदियां एवं कुओं के पानी का उपयोग करते हैं।

भक्त के घर आने की अनूठी परंपरा
जलविहार के दिन विमानों में सवार देवों के भक्त के घर आने की अनूठी परंपरा है। जलविहार की शाम को भ्रमण के उपरांत मंदिर जाने से पूर्व देवों के विमान भक्त के घर आते हैं, जहां उनकी आरती उतारी जाती है। इसके बाद ही वे मंदिरों की ओर रवाना होते हैं।

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