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Jhansi Bureau Updated Wed, 07 Nov 2018 02:13 AM IST
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मूलभूत सुविधाओं से वंचित मोगिया जनजाति के लोग
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डिबिया की रोशनी से रोशन होते हैं घर-आंगन
रोशनी का पर्व दीपावली अंधेरे में मनाते हैं लोग
अमर उजाला ब्यूरो
पुलवारा। मोगिया बस्ती में बिजली नहीं आने से यहां ग्रामीण अंधेरे में त्योहार मनाने को मजबूर हैं। जिले के ब्लॉक बार अंतर्गत ग्राम जरावली के मजरा मोगिया बस्ती में रहने वाले मोगिया जनजाति के लोग आजादी के सात दशक बाद भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। करीब ढाई सौ की आबादी वाले इस मजरे में ना तो आज तक बिजली पहुंची है एवं ना ही यहां पर शौचालयों का निर्माण हुआ है। मूलभूत सुविधाओं से वंचित होने के कारण यह प्रमुख जनजाति इस आधुनिक युग में भी दयनीय जीवन जीने को मजबूर है।
केंद्र सरकार द्वारा जहां गरीबों व वंचितों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने हेतु करोड़ों रुपये खर्च कर तरह-तरह की महत्वाकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिससे लोगों का जीवन स्तर सुधरे व वे समाज में सम्मान भरी जिंदगी जी सकें। लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी सरकार की योजनाओं को खास तवज्जो नहीं दी जा रही है। इसके कारण ग्राम जरावली की मोगिया बस्ती के लोग आज भी तंबूओं व कच्चे मकानों में रहकर जीवन यापन कर रहे हैं। इन लोगों के पास आज तक बिजली ना पहुंचने के कारण शाम होते ही अंधेरा छा जाता है। केंद्र सरकार का दीवाली तक हर गांव-मजरों को सौभाग्य योजना के तहत रोशन करने का उद्देश्य है, लेकिन लगता है कि इस जनजाति के लोगों का विद्युत रोशनी में रहने का सौभाग्य ही नहीं है। इसके चलते इस आधुनिक युग में भी इन लोगों के घर-आंगन डिबिया की रोशनी से रोशन होते हैं। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई कैसे होती होगी इसका अंदाजा आराम से लगाया जा सकता है। योगी सरकार ने बिजली से महरूम गांवों में बिजलीकरण कर दीवाली मनाने के निर्देश दिए थे. सरकार के उस आदेश के बाद लोगों में एकबार फिर से उम्मीदें जगी थीं, लेकिन सरकार के आदेश को बिजली विभाग ने गंभीरता से नहीं लिया और अब तक इस मजरे में बिजली नहीं पहुंच पाई है. हमेशा की तरह इस बार की दिवाली भी इस गांव के लोगों ने अंधेरे में मनाएंगे।

‘बिंदी, कँगन बेचकर होता है जीवन-यापन’
मोगिया जनजाति के लोग अपना जीवन यापन बड़ी ही मुश्किल से कर पाते हैं इस जनजाति का प्रमुख व्यवसाय महिलाओं द्वारा बिंदी, कंगन, सिंदूर आदि बेचकर किया जाता है। महिलायें अपने छोटे- छोटे बच्चों को पीठ पर बांधकर गांव-गांव में फेरी लगाकर अपना एवं अपने परिवार का गुजारा करती हैं। हालांकि कुछ लोगों के पास सरकार द्वारा पट्टे भी दिये गये हैं। लेकिन यह जमीन नाम मात्र के लिए है। इसी जमीन पर यह लोग थोड़ी सी खेती भी कर लेते हैं,लेकिन वह खेती न के बराबर है। एवं यहीं पर तंबुओं में रहते हैं।

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