मुनाफे की खेती के लिए कर रहे हैं पानी का दोहन

Lakhimpur Updated Tue, 06 May 2014 05:31 AM IST
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कई फसलें जरूरत से ज्यादा सोख रहीं हैं भूमि की नमी
बढ़ रहा साठा धान का रकबा, घट रहा जलस्तर
अमर उजाला ब्यूरो
लखीमपुर खीरी। तराई के किसान अधिक फसलें लेने के लिए परंपरागत खेती से हटकर कुछ ऐसी फसलों की खेती करने लगे हैं जिनके लिए ज्यादा पानी की जरूरत होती है। गन्ना, केला, मेंथा और साठा धान ऐसी ही फसलें हैं जो पानी का अधिक दोहन करती हैं। यहां भूगर्भ जलस्तर घटने का एक बड़ा कारण यह भी है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समझदारी से फसलों का चयन न किया तो आने वाले वर्षों में भूगर्भ जलस्तर गिरता जाएगा।
तराई में दोहरी फसल लेने के लिए वर्षा शुरू होने के पहले गर्मी के मौसम में साठा धान की खेती जोरों पर हो रही है, इसके लिए पानी की ज्यादा जरूरत होती है। वर्षा के पहले पानी की जरूरत पूरी करने के लिए भूगर्भीय जल का दोहन कर खेतों को भरना पड़ता है। अधिक पानी का दोहन होने से जलस्तर कम हो रहा है। इसी वजह से पंजाब और हरियाणा राज्यों में साठा धान की खेती प्रतिबंधित है, लेकिन तराई में इसकी खेती का रकबा हर साल बढ़ता जा रहा है।
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साठा धान दूसरी फसलों के लिए बनेगा घातक
जिला कृषि अधिकारी डीएस चौधरी कहते हैं कि धान, गन्ना, केला, मेंथा फसलों के अलावा पापुलर और यूकेलिप्टिस के पेड़ पानी का ज्यादा दोहन करते हैं। धान वर्षा में होता है, इसलिए उसके लिए जरूरत का पानी बरसात के पानी से मिल जाता है। साठा धान गर्मी के मौसम में लगाया जाता है, इसके लिए पानी का इंतजाम बोरिंग से खेत में पानी भर कर किया जाता है। तराई में साठा धान का रकबा बढ़ने से बड़े पैमाने पर पानी का दोहन होता है। उन्होेंने बताया कि फिलहाल शासन ने इस पर अभी तक रोक लगाने की दिशा में कोई पहल नहीं की है।
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कम हो रही भूमि की नमी से घटेगा उत्पादन
कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुहैल कहते हैं कि भूमि से अधिक मात्रा में नमी का शोषण होने और भूगर्भ जल के अंधाधुंध दोहन से भूगर्भीय जलस्तर में भारी गिरावट आ रही है। भूमि की नमी खत्म हो रही है। इसका प्रभाव दूसरी फसलों पर भी पड़ेगा। आने वाले दस साल में धान ही नहीं अन्य फसलों का उत्पादन कम होगा। सिंचाई के बिना कोई भी फसल लेना मुश्किल हो जाएगा। अधिक पानी का दोहन करने वाली फसलों पर नियंत्रण जरूरी है। उनका कहना है फव्वारा और टपक विधि से खेतों की सिंचाई करने से किसान पानी की बर्बादी रोक सकते हैं।
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किसान भी कम जिम्मेदार नहीं
बांकेगंज के प्रगतिशील किसान प्रेम बिहारी लाल का कहना है कि लगातार गिरते भूगर्भीय जलस्तर के लिए किसान खुद जिम्मेदार हैं। कम समय में अधिक उपज के लिए पिछले कुछ वर्षों से बड़े पैमाने पर साठा धान की खेती हो रही है। इस पर रोक लगनी चाहिए।
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साठा धान की खेती नुकसानदेह
प्रगतिशील किसान हरीश तिवारी कहते हैं कि साठा धान की खेती नुकसानदेह साबित हो रही है। इसके चलते भूगर्भीय जलस्तर में गिरावट आ ही रही है। साठा धान की रोपाई के बाद खेत में भूरा-फुदका कीट पैदा हो जाते हैं जो अगली फसल नुकसान पहुंचाता है।
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भूगर्भीय जल का सरंक्षण जरूरी
प्रगतिशील किसान उत्तम कुमार टंडन का कहना है कि तराई की धरती पर केला और साठा धान की खेती धीरे-धीरे चिंता का विषय बन रही है। इसमें अंधाधुंध भूगर्भीय जल का दोहन हो रहा है। जिसके चलते जलस्तर में लगातार गिरावट आ रही है।
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सिर्फ तात्कालिक फायदा
प्रगतिशील किसान अरुण सक्सेना का कहना है कि गिरता भूगर्भीय जलस्तर आने वाली पीढ़ी के लिए बड़ी समस्या होगी। किसान अपने मुनाफे के लिए साठा धान और केले की खेती कर रहे हैं, जो फायदेमंद जरूर साबित हो रही है, पर आने वाली पीढ़ियों के लिए खुद खाई खोदने जैसा है।
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