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कई बार सुनाई जा चुकी जिले में फांसी की सजा

Lakhimpur Updated Sun, 10 Feb 2013 05:32 AM IST
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फंदा नहीं पहुंच सका गर्दन तक
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लखीमपुर खीरी । देश की आजादी के बाद जिले में अपराधियों की करतूत सुनने के बाद कई मामलों में अदालतों ने फांसी की सजा सुनाई। फांसी ही सजा हर बार सुर्खियां पाई, लेकिन कहीं सबूतों की कमीं से तो कभी कानूनी अड़ंगेबाजी के चलते हर बार कानूनी फंदा कमजोर पड़ गया। अंग्रेज हुकूमत के बाद से जिले में बर्बरता की कई कई वारदातें हुईं, कई मामलों में फांसी बोली भी गई, लेकिन अपराधियों की गर्दन में फंदा कभी कस नहीं सका।
सांप्रदायिक तनाव के माहौल में भी लगभग शांतिप्रिय रहने वाले जिला खीरी में भी अपराधियों ने बर्बर वारदातों को अंजाम दिया। उनकी खूंखार दास्तांन को सुनने के बाद कई मामलों में फांसी की सजा भी सुनाई गई।

केस एक: बजरखा कांड
सबसे चर्चित मामला मितौली थाना क्षेत्र के बजरखा कांड के नाम से प्रसिद्ध हुआ। एक ही परिवार के कई सदस्यों की हत्या कर उनके सिर काटकर पूरे गांव में घुमाने के बाद शव को आग के हवाले कर दिया गया था। मामले की सुनवाई के बाद जिला अदालत ने हत्याभियुक्तों को फंासी की सजा सुनाई थी, लेकिन मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंचते-पहुंचते सजा फांसी से उम्रकैद में तब्दील हो गई।
केस दो: पदुम कश्यप
इसके बाद दूसरा मामला मैगलगंज थाना क्षेत्र के पदुम कश्यप का था। इस मामले में एक विकलांग किशोरी की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। दुराचारी हत्यारे को फंासी की सजा दी गई, लेकिन हाईकोर्ट ने सुनवाई के बार सजा के लिए सबूतों को नाकाफी बताते हुए सजा ही निरस्त कर दी और आरोपी को निर्दोष बरी करने का फैसला दे दिया।
केस तीन: मंजूनाथ कांड
मिलावटी तेल के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले एस मंजुनाथ की निर्मम हत्या करने के मामले में सुनवाई के बाद जिला जज एसएमए आब्दी ने आरोपी पवन मित्तल मोनू को फंासी की सजा सुनाई थी, मामले की अपील सुनने के बाद इसे फांसी के लिए नाकाफी पाया, हाईकोर्ट लखनऊ बेंच ने फांसी को उम्रकैद में तब्दील कर दिया।
के स चार : बालिका की बलि का मामला
भीरा थाना क्षेत्र में छह वर्षीय अबोध बालिका वंदना की सिर काटकर नर बलि देने के बर्बर मामले में सुनवाई करते हुए एफटीसी जज वाणी रंजन अग्रवाल ने तांत्रिक हत्यारे मेवा लाल को फांसी की सजा सुनाई थी, जबकि उसकी सहायता करने वाले रामनिवास व यूसुफ को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो अपील की सुनवाई के बाद पूरे फैसला ही उलट गया, आरोपी पर्याप्त सबूताें के अभाव में बरी हो गए।

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