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तैंतीस माह तक जलाए रखी आजादी की मशाल

Lakhimpur Updated Sat, 26 Jan 2013 05:30 AM IST
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अशोक निगम
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लखीमपुर खीरी। जब पूरे देश पर गुलामी के काले बादल छाए थे उस समय यहां के क्रांतिकारियों ने इस पूरे इलाके को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद करा लिया था। यह आजादी पूरे 33 महीने तक कायम रही। सबसे बड़ी बात यह रही कि यहां प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई करने वाले राजा लोने सिंह शरणागत भगोड़े अंग्रेजों को शरण दे रहे थे तो दूसरी तरफ क्रांति का संचालन भी कर रहे थे।
फरवरी 1856 में अवध की नवाबी समाप्त होने के बाद मोहम्मदी को जिला मुख्यालय बनाया गया। इलाके के जमीदार एकजुट होकर आजाद होने के लिए संघर्ष को तैयार होने लगे। 31 मई 1857 को क्रांतिकारी सेनाओं ने शाहजहांपुर पर अधिकार कर लिया। इस घटना से अंग्रेज अधिकारी बहुत डर गए। घबराए अंग्रेज महिलाओं और बच्चों की एक टोली मितौली में शरण लेने आ पहुंची।
क्रांति के संचालन के साथ शरणागत की रक्षा भी
राजा लोने सिंह ने भारतीय परंपरा और धर्म के अनुसार अंग्रेज शरणार्थियों को अपने यहां शरण देने के साथ क्रांति का संचालन भी किया। महिलाओं और बच्चों को राजा लोने सिंह की शरण में देने के बाद उन्होंने अपना खजाना मितौली के किले में भेजना चाहा लेकिन इस खजाने पर रास्ते में ही अंग्रेजों ने अपना अधिकार कर लिया। साथ ही जेल तोड़कर बंदियों को मुक्त करा लिया। यह घटना एक जून 1857 की है।
क्रांतिकारियों ने मौत के घाट उतारा अंग्रेजों को
खजाना लुटने की घटना से अंग्रेज बहुत घबरा गए और उन्होंने मोहम्मदी छोड़ने का निश्चय किया। चार जून को सभी अंग्रेज मोहम्मदी से भाग खड़े हुए। रात उन्होंने बरबर में बिताई। पांच जून को सवेरे ही फिर चल पड़े। इसी बीच क्रांतिकारियों ने औरंगाबाद के निकट सभी अंग्रेजों को मार डाला। केवल कप्तान ओर बच पाया। उसे मितौली लाया गया। राजा लोने सिंह ने उसे भी शरण दी।
सीतापुर में उखड़ गई अंग्रेजी सत्ता
इसी बीच सीतापुर में भी अंग्रेजी सत्ता उखड़ गई। मल्लापुर भी उस समय एक जिला था। सीतापुर के कुछ अंग्रेज भागकर मल्लापुर भी पहुंचे लेकिन जल्दी ही मल्लापुर को भी आजाद करा लिया गया। जिलाधीश गोने और कैप्टन हैस्टिंग्ज ने अन्य तमाम अंग्रेजों के साथ भाग कर धौरहरा के जांगड़ा राजा इंद्र विक्रम सिंह के यहां शरण ली।
आजादी की रक्षा के साथ लखनऊ की मदद
इस प्रकार पूरे जिले में स्वतंत्रता का झंडा लहराने लगा। यहां के राजाओं ने अपने क्षेत्र में स्वाधीनता के युद्ध को छेड़ने के साथ समय-समय पर लखनऊ को भी सहायता दी। इसके साथ ही अपनी शक्ति को सुदृढ़ करने पर ध्यान दिया। जब लखनऊ फिर अंग्रेजों के अधिकार में आ गया तो यहां के राजा और दूसरे प्रभावशाली लोग ज्यादा सक्रिय हो गए और पूरी ताकत के साथ अहमद उल्ला की अगुवाई में आगे बढ़कर स्वतंत्रता का युद्ध लड़ा। कंपनी की सेनाओं ने 30 अप्रैल 1858 को शाहजहांपुर पर चढ़ाई कर दी। अहमदउल्ला को वहां से हटना पड़ा। अंत में पुवायां में 5 जून 1858 को उनकी हत्या कर दी गई।
और फिर गुलामी की साया
शाहजहांपुर पतन के बाद बरसात का मौसम होने के कारण कुछ समय तो अंग्रेज शांत रहे। बाद में हमला कर मोहम्मदी पर अधिकार कर लिया और आगे बढ़कर मितौली की घेराबंदी कर दी। राजा लोने सिंह अपने थोड़े से सैनिकों के साथ बड़ी बहादुरी से लड़े लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। आठ नवंबर 1858 को मितौली के पतन के बाद फिर यहां गुलामी की काली साया मंडराने लगी।
जिले ने 33 माह तक लिया ब्रिटिश शक्ति से लोहा
इस तरह फरवरी 1856 से आठ नवंबर 1858 तक पूरे 33 यह जिला स्वतंत्र रहकर ब्रिटिश शक्ति से लोहा लेता रहा। इस समूची अवधि में बहराइच जिले को छोड़कर सबसे लंबे समय तक यहां के लोगों ने आजादी की रक्षा की और सबसे ज्यादा बलिदान दिए।
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