जैव संपदा से माटी को उपजाऊ बनाएं

Lakhimpur Updated Mon, 17 Dec 2012 05:31 AM IST
लखीमपुर खीरी। असंतुलित मात्रा में रसायनिक खादों और कीटनाशक दवाओं के अधिक प्रयोग से मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवों में लगातार कमी आ रही है। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति घट रही है। फसलों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि आधुनिक तकनीकों के मिश्रण से जैव संपदा का संवर्द्धन और सरंक्षण कर मिट्टी को फिर से जगाया जा सकता है।
देश में जैविक कृषि का इतिहास 5000 साल से भी अधिक पुराना है। इसके चलते मिट्टी ने अपनी उर्बरा शक्ति को संजोए रखा। हरित क्रांति व कृषि औद्योगीकरण के नाम पर सघन खेती और अधिक उत्पादन पाने के लिए असंतुलित मात्रा में रसायनिक खादों में कीटनाशकों के प्रयोग के कारण मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों में दिन प्रतिदिन कमी आती जा रही है। इससे मिट्टी मौजूद तत्वों नाइट्रोजन, रोगों और हानिकारक कीटों को नियंत्रित करने में मिट्टी असफल हो रही है।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुहेल कहते हैं कि परंपरागत प्रणाली और आधुनिक तकनीक के समिश्रण से जैव संपदा का संवद्धन और सरंक्षण किया जा सकता है। इसके लिए संतुलित और जैविक खेती की प्रणाली को अपनाना होगा। मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ाने के लिए राइजोवियम कल्चर, पीएसवी कल्चर, एजेक्टोवेक्टर, नील, हरित शैवाल, केचुआ, नाडेप खाद, ट्राइकोड्रमा पाउडर, बेबेरिया बैसियाना सिडोमोनास, नीम तेल, खली आदि का विभिन्न फसलों में बीज शोधन, जड़ शोधन और भूमि शोधन के लिए किया जाता है।
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फसलों के लिए पोषक तत्व जुटाते है जीवाणु
डॉ. सुहैल बताते हैं कि दलहनी फसलों में राइजोवियम और गन्ना गेंहूं आदि में एजेक्टोवेक्टर की अलग-अलग प्रजातियों का प्रयोग किया जाता है। यह जीवाणु वातावरण में मौजूद नाइट्रोजन को शोधित कर फसल को उपलब्ध कराता है। पीएसबी कल्चर का सूक्ष्म जीव भूमि में अघुलनशील फास्फोरस को घुलनशील बनाकर पौधे को उपलब्ध कराता है। ट्राइकोड्रमा पाउडर का प्रयोग फसलों में लगने वाले सूखा रोग सड़न आदि में बीज शोघन के रूप में किया जाता है। पत्तियों पर भी छिड़काव होता है।
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बीमारियों, कीटों से बचाव करते हैं जैविक तत्व
आधुनिक तकनीक के तहत स्यूडोमोनास आलू, खीरा, मिर्चा, टमाटर, बैंगन आदि में लगने वाली बीमारियों में पत्तियों पर छिड़काव किया जाता है। बैविरिया बेसियाना कवक का प्रयोग दीमक, सुंडी, गव, विविल आदि कीटों से बचाव के लिए किया जाता है। डॉ. सुहैल का कहना है कि भूमि में कार्बनिक खादों का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा किया जाना चाहिए ताकि सूक्ष्म जीवाणु भूमि में अधिक संख्या में उपलब्ध हो सकें।

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