किरन के जज्बे को सलाम

Lakhimpur Updated Mon, 10 Dec 2012 05:30 AM IST
विकलांग छात्रा की चचेरी बहन बनी बैसाखी
बांकेगंज। भले ही वह दोनों पैरों से विकलांग है। गांव से स्कूल की दूरी तीन किमी से भी ज्यादा है। मुफलिसी के चलते आठवीं की पढ़ाई के बाद गरीब मां-बाप में बेटी को आगे पढ़ाने की कुब्बत नहीं, फिर भी गांव सिकंदरपुर की दोनों पैरों से विकलांग छात्रा किरन के हौसले देख किसी तरह उसके लिए शिक्षा की व्यवस्था की गई। यही नहीं किरन को इस मुकाम तक पहुंचाने में साथ दिया उसी स्कूल में पढ़ने वाली उसकी चचेरी बहन बिरला देवी ने।
श्री गुरुनानक इंटर कॉलेज पहाड़पुर में गांव सिकंदरपुर की 12वीं कक्षा में तालीम पा रही किरन जन्म से ही दोनों पैरों से विकलांग है। पिता की आर्थिक स्थिति ठीक न होते हुए जैसे-तैसे उसने आठवीं तक की पढ़ाई लिखाई पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए उसके इरादे मजबूत थे। विकलांगता और तंगहाली की बाधा पहाड़ सी चुनौती थी। गांव से स्कूल की दूरी भी तीन किमी। माता-पिता ने पढ़ाई में उसकी लगन को देखकर उसे आगे की पढ़ाई करने के लिए हामी भर दी। किरन खुशी से उछल पड़ी। पुरानी कहावत है कि जिसका कोई नहीं उसको सहारा ऊपर वाला देता है।
स्कूल आने-जाने की समस्या किरन की पढ़ाई पूरी करने की जिद आसमान में छेद करने सरीखी थी। उसी स्कूल में पढ़ने वाली उसकी चचेरी बहन बिरला देवी ने किरन के सपने कारगर करने का बीड़ा उठाया। उसके हामी भरने पर किरन के सपनों के पंख लग गए। बिरला पिछले चार सालों से विकलांग बहन को गांव से साइकिल पर बैठाकर तीन किमी लंबा सफर तय करके स्कूल लाती और ले जाती है। किरन ने दसवीं की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में पास की। उसकी पढ़ाई में लगन देख पूरे स्कूल के विद्यार्थी उसकी हर कदम पर मदद करने को आतुर रहते हैं। स्कूल के गेट से कक्षा में प्रवेश के समय तक उसका बस्ता थामने को मदद के लिए कई हाथ एक साथ आगे बढ़ जाते हैं।
किरन छह भाई-बहनों में दूसरे नंबर की है। मां रामवती और पिता रामस्वरूप खेती-किसानी कर बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च जैसे-तैसे चलाते है। स्कूल के प्रिंसिपल कुलवंत सिंह चीमा, शिक्षक हरिहर अवस्थी, कक्षा अध्यापक श्रवण वाजपेयी किरन की पढ़ाई में रुचि देख कर उसे इंटर में टॉप करने के लिए प्रोत्साहित करते रहते है।
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मजबूत इरादों वाली छात्रा किरन का कहना है, कि गुरुजनों से सुना है कि मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती। कोई काम पूरी लगन से किया जाता है तो उसमें सफलता जरूर मिलती है। आठवीं पास करते ही मैंने ठान लिया था कि कुछ भी हो जाए ग्रेजुएट तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिविल इंजीनियर बनना है। मेरी हर परेशानी में मेरे गुरुजन और सहेलियां मेरा भरपूर सहयोग देते हैं।

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