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डीसीबी अध्यक्ष पद को ‘कद्दावर’ पड़ेगा भारी!

Lakhimpur

Updated Fri, 07 Dec 2012 05:30 AM IST
रार ज्यादा बढ़ी तो ‘तीसरा’ मार सकता है बाजी
सपा हाईकमान ने गड़ाई नजर, छानबीन के बाद ही लेेंगे निर्णय
अमित गुप्ता
लखीमपुर खीरी। डीसीबी अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर सपा में तेज गहमा-गहमी के बीच गोटियां बिछनी शुरू हो गईं हैं तो संभावित उम्मीदवारों के प्रोफाइल के साथ ही उनके बैकग्राउंड को भी खंगाला जाएगा। ताकि पार्टी में कार्यकर्ताओं के बीच दरार न पड़े और सही उम्मीदवार के सहारे डीसीबी अध्यक्ष पद की कुर्सी पर सपा का झंडा लहरा सके। इस लिहाज से अब तक उम्मीदवारी की दौड़ में एक कद्दावर नेता ही भारी पड़ सकते हैं।
संभावित उम्मीदवारों ने अपनी-अपनी गोटियां बिछाने के साथ ही विधायकों का समर्थन हासिल करने का भरसक प्रयास किया था, लेकिन रार बढ़ती देख विधायकों ने अपने-अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। पार्टी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि जिन विधायकों ने लेटरपैड पर एक संभावित उम्मीदवार का समर्थन करने की वकालत की थी, उन्होंने अपने लेटरपैड को वापस हासिल करने की जुगत शुरू कर दी है। वहीं इस मुद्दे पर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती रार को देखते हुए जिले के सपा नेताओं ने भी सुर बदल दिए हैं और अब उम्मीदवार के चयन का फैसला हाईकमान पर छोड़ दिया है। हालांकि जनवरी में होने वाले इस चुनाव को लेकर पार्टी के पास विचार-विमर्श के लिए पर्याप्त समय है, लेकिन जिले भर में 60 बैंक शाखाओं के नेटवर्क पर कब्जा करने की सियासत हावी हो गई है। दोनों संभावित उम्मीदवार कई बार इस सीट का सुख भोग चुके हैं, जिससे लड़ाई और तेज होने की प्रबल संभावना है। जिला नेतृत्व के हाथ खड़े कर देने के बाद संभावित उम्मीदवार हाईकमान की गणेश परिक्रमा में जुट गए हैं। सूत्र बताते हैं कि दोनों की लड़ाई के बीच हाईकमान तीसरे सशक्त उम्मीदवार के विकल्प पर भी मंथन कर सकता है, जिससे सपा में बगावत की स्थिति न बने।
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संभावित उम्मीदवारों के बैकग्राउंड पर एक नजर
सपा गठन के समय वर्ष 1992 से जुड़े पपिल मनार चार बार डीसीबी अध्यक्ष पद पर काबिज हो चुके हैं। उन्होंने जिले में सपा नेता और पूर्व मंत्री यशपाल चौधरी, स्व.प्रभात गुप्ता, कय्यूम खां, दिग्विजय सिंह आदि के साथ पार्टी का झंडा बुलंद किया था। उधर, हाल में ही दल बदलकर सपा में आए निवर्तमान अध्यक्ष मनोज अग्रवाल उन्हें चुनौती पेश कर रहे हैं। उनके कॅरियर पर गौर करें तो वर्ष 1997 में ब्लाक फूलबेहड़ के गांव सैदापुर स्थित जिला सहकारी बैंक के एकाउंटेंट पद से इस्तीफा दिया था, जिसके बाद से वह सक्रिय राजनीति में हैं। वर्ष 1999 में भाजपा सरकार के समय वह तत्कलीन कबीना मंत्री के सहयोग से जिला सहकारी बैंक के डायरेक्टर बने थे। इसके कुछ समय बाद पीसीएफ के चेयरमैन भी बने। भाजपा की सरकार जाने के बाद बसपा का दामन थामा और 2009 में डीसीबी अध्यक्ष पद पर काबिज हो गए। बसपा सरकार में ही वह फेडरेशन संघ के डायरेक्टर भी बने थे। सपा सरकार आते ही उन्होंने एक बार फिर से पाला बदल दिया।
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इस चुनाव में जिला नेतृत्व कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। पार्टी कार्यकर्ता अनुशासित तरीके से प्रदेश नेतृत्व के निर्देशों का पालन करेगी। उम्मीदवार चयन का निर्णय हाईकमान स्वयं लेगा।
-शशांक यादव, जिलाध्यक्ष, सपा
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