गन्ने के सीजन में बाहर आते जंगली जानवर

Lakhimpur Updated Fri, 07 Dec 2012 05:30 AM IST
अशोक निगम
लखीमपुर खीरी। सर्दियों का मौसम यानि वन विभाग के लिए मुसीबत ही मुसीबत। इन दिनों वन अपराधों में तो बढ़ोतरी होती ही है। जानवरों के जंगल से बाहर निकलने का खतरा भी बढ़ जाता है। वनों के किनारे खेतों में गन्ने की फसल तैयार होने पर जंगली जानवर जंगल से बाहर निकल कर गन्ने के खेतों में आ जाते हैं। बाघों के खेतों और आबादी क्षेत्र में आने का सिलसिला शुरू हो चुका है। इसे देखते हुए वन विभाग ने सतर्कता बढ़ा दी है।
दक्षिण खीरी वन प्रभाग के गोला रेंज में अलीगंज क्षेत्र के ब्रांच नहर के आसपास कई दिनों से बाघ जंगल से निकल कर खेतों में सक्रिय है। उधर, भीरा रेंज के गुलाब टांडा गांव के आसपास बाघ की मौजूदगी दर्ज की गई है। बीते दो माह के अंदर बाघ के हमले से दो लोग घायल भी हो चुके हैं। जबकि एक बाघ तो गुलाब टांडा गांव के अंदर घुस कर एक भैंस को खींच ले गया। इस बाघ ने बरौछा नाला के आसपास डेरा बना रखा है। उत्तर खीरी वन प्रभाग के संपूर्णानगर क्षेत्र में भी बाघ और तेंदुआ आबादी के आसपास मंडरा रहा है।
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दखलंदाजी से बढ़ता टकराव
बीते तीन दिसंबर को किशनपुर सेंक्च्युरी के मड़हा बीट में झोपड़ी बनाने के लिए घास फूस लेने जंगल में गए खंजनपुर निवासी 50 वर्षीय इंदर को बाघिन ने हमला कर बुरी तरह घायल कर दिया। इससे पहले 19 सितंबर को भीरा रेंज के पल्हनापुर बीट में कटरुआ बीनने गए 25 वर्षीय पप्पू पर बाघ ने हमला किया था। दोनों घटनाएं जंगल के अंदर हुई। बाघ तभी हमलावर होते हैं, जब कोई उनके प्राकृतिक आवास में खलल डालता है। यही बाघों पर भी लागू होता है। बाघ जंगल से निकलकर इंसानी बस्ती में आता है, तो वे भी खतरे में पड़ जाते हैं।
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गन्ने के खेत बाघों के प्राकृतिक आवास
जंगल से सटे खेतों में गन्ने की फसल तैयार होने पर बाघों और तेंदुओं के प्राकृतिक आवास बन जाते हैं। नरकुल के जंगल बाघों के पसंदीदा प्राकृतिक आवास हैं। बाघों के लिए गन्ने की फसल और नरकुल के जंगल में कोई फर्क नहीं होता। गन्ना तैयार होने पर नील गाय, हिरन और जंगली सुअर बड़ी संख्या में गन्ने के खेतों में आ जाते है। बाघ और तेंदुए इन जानवरों के शिकार के लिए जंगल से बाहर का रुख करते हैं।
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बाहर सुरक्षित नहीं जानवर
जंगल से निकलते ही जानवर खतरे में पड़ जाते हैं। वर्ष 2008 में धौरहरा रेंज के जंगल से एक तेंदुआ निकल कर आबादी में आ गया था। उसने कई पालतू मवेशियों को निवाला बनाया। कई महिला पुरुषों की जान ली और कई को जख्मी कर दिया। बाद में आक्रोशित ग्रामीणों ने तेंदुए को घेर उसे एक घर में जिंदा जला दिया। भीरा रेंज के कांप टांडा में भी चार साल पहले से एक बाघ से आतंक से पूरा इलाका थर्राया रहा। नौ लोगों की जान लेने के बाद आखिरकार उसे गोली मार दी गई। इससे पहले भी ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं। जंगल से बाहर निकलने पर उनके शिकार की आशंका भी बढ़ जाती है।
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बाघों और इंसानों के बीच टकराव रोकने और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए क्विक रिस्पांस टीम गठित की गई है। टीम के तीन सदस्यों को ट्रेंकुलाइज करने का प्रशिक्षण दिया गया है। बाघों के आबादी में आने पर यह टीम तुरंत मौके पर पहुंचकर एक्शन लेगी। इसके साथ ही जंगलों की सुरक्षा के लिए गश्त बढ़ाई जा रही है।
-नीरज कुमार, डीएफओ साउथ, लखीमपुर खीरी।

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