बुजुर्गों की सेवा फर्ज ही नहीं फक्र भी है

Lakhimpur Updated Mon, 01 Oct 2012 12:00 PM IST
लखीमपुर खीरी। परिवार का बुजुर्गों के प्रति प्यार, सेवा, सम्मान का भाव देखना है तो यहां देखने को मिलेगा। जिले में जहां आपको 100 साल ऊपर की बुजुर्ग महिला की सेवा करते उसकी चार पीढ़ियां नज़र आएंगी, वहीं बुजुर्ग भी परिजनों की तरफ से खुश दिखेंगे। वृद्ध आश्रम में छाया सन्नाटा लोगों में भारतीय सभ्यता और परंपरा को और सुदृढ़ बनाता है।
शहर के मुहल्ला नौरंगाबाद निवासी सकूना के परिवार वालों की मानें तो वह अपने जीवन के सवा सौ बसंत देख चुकी हैं। वर्तमान में वह अपने पोते इदरीश अली के भरे पूरे परिवार के साथ रहती हैं। इस उम्र में भी वह अपने सभी दैनिक कार्य स्वयं करती हैं। इदरीश अली की पत्नी शाहिना अंजुम कहती हैं कि उन्हें अपनी ददिया सास की खिदमत करते अच्छा लगता है। सकूना की बड़ी पुत्री रंगीला भी करीब 100 साल उम्र की हो चुकी हैं। सकूना की दो दिन से तबीयत खराब होने की खबर सुनी तो वह अपना बुढ़ापा भूल सेवा को चली आईं। यह सभी वृद्ध महिलाएं परपोते-परपोतियों की अपनी सेवा से बेहद खुश हैं।

सूना पड़ा वृद्ध आश्रम
तेजी से बढ़ते पॉश्चात्य सभ्यता को देखते हुए शहर निवासी समाज सेवी सेवक सिंह अजमानी भी कई साल पहले चिंतित हो गए थे। नतीजन उन्होंने भीरा रोड पर गुरुनानक वृद्ध आश्रम का निर्माण कराया। उसमें करीब 100 वृद्धों के रहने और उनके भोजन आदि की व्यवस्था भी है, लेकिन इसे भारतीय परंपरा की मिसाल ही कहेंगे कि जिले से किसी भी व्यक्ति ने अपने बुजुर्ग को इस आश्रम में खुद की आजादी के लिए अकेला नहीं छोड़ा। जिसके चलते कई साल पहले बने इस आश्रम में अब तक सन्नाटा छाया हुआ है।

77 हजार बुजुर्गों को मिल रही पेंशन
करीब 40 लाख से अधिक की आबादी वाले जिले में समाज कल्याण विभाग से 77 हजार बुजुर्ग पेंशन का लाभ पा रहे हैं। यह आंकड़ा पिछले कई सालों से चला आ रहा है, जबकि जिले में करीब इतने ही और बुजुर्ग इस योजना का लाभ पाने से अभी वंचित बताए जा रहे र्हैं। जिला प्रशासन का कहना है कि इस जिले के लिए इतना ही कोटा निर्धारित है।
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बुजुर्गों के प्रति क्या कहते युवा
परदादी सकूना की सेवा करने में काफी फक्र महसूस होता है। यह सौभाग्य हर किसी को मिल पाना मुमकिन नहीं है। बुजुर्गों की दुआओं से बड़ी कोई दौलत नहीं होती।
शबीना अंसारी, परपोती


मेरी दादी मेरे पापा-मम्मी के साथ ही रहती हैं। काफी बुजुर्ग होने के बाद भी वह हम लोगों को समय से खाना खाने, उठने, पढ़ने के लिए टोकती रहती हैं। कुल मिलाकर मेरी दादी मेरी मम्मी से कहीं अधिक हम लोगों का ख्याल रखती हैं। हम लोग भी उनकी खिदमत में कोई कमी नहीं आने देते।
निशा खानम,

मेरे दादा-दादी नहीं है। मेरे वालिद का भी काफी पहले इंतकाल हो चुका है। उन सबकी कमी मुझे बेहद खलती है। मेरी बुजुर्ग मम्मी मेरे साथ रहती हैं। वह तमाम ऐसी बातें बताती हैं जो जीवन में बहुत उपयोगी होती है। उनकी खिदमत कर बेहद खुशी मिलती है।
शाहीन, सेल्स मैनेजर इलेक्ट्रानिक वर्ल्ड

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