कोरे कागजों पर भरे सपनों के रंग

Lakhimpur Updated Mon, 20 Aug 2012 12:00 PM IST
बिजुआ। इन हाथों को कलम कागज पकड़े अरसा हो चुका था, बेटों की पढ़ाई के लिए इनके अरमान पूरे नहीं हो पा रहे थे। स्कूल जाते अपने भाइयों को किवाड़ के पीछे से निहारते रहने वाली बेटियों के लिए किताबें ख्वाब बन र्गइं थी और स्कूल आसमान के तारे, जिन्हें महज निहारा जा सकता था अपना बनाने की सोचना भी गुनाह था, तभी बेटियों को घर के चूल्हे - चौके से आजादी दिलाकर एक बार फिर से किताबों से रिश्ता जोड़ने की शुरुआत की गईं। कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका स्कूल की बदौलत इन बेटियों को स्कूल की चौखट तक लाने से ही इनके ख्वाबों को पंख मिल गए, और यहां एक नया आसमान। कई सालों तक किताबों से दूर रहने वाली बेटियां अब यहां महज पढ़ाई ही नही करतीं बल्कि यहां जिन्दगी के नए आयाम सीखती हैं।
महज तीन साल पहले शुरू हुए कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में प्रवेश का पैमाना जरा दूसरे विद्यालयों से हटकर है, यहां आने वाली बेटियों का एजूकेशन लेबल नहीं उनकी पढ़ने की चाहत देखी जाती है। कभी घर की गरीबी तो कभी घर से स्कूल की दूरी, ऐसे न जाने कितने रोड़े इन बेटियों की पढ़ाई की राह में आते हैं। बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार की शुरू हुई बॉ स्कूल योजना से इनकी किस्मत बदल गई। कई साल तक किताबों से दूर रहने वाली इन बेटियों को पढ़ने के साथ बॉ स्कूल में खाना, कपड़ा, बिस्तर के साथ हर जरूरी सामान मुहैय्या होता है। कच्चे घरों से निकलकर बॉ स्कूल की आलीशान इमारत में पढ़ने आने वाली बेटियां यहां पढ़ाई के साथ अपनी सपनों को भी पूरा कर रहीं हैं। किसी को पेंटिंग में महारथ है तो कि सी को डांस में, तो कोई पोस्टर पर अपने सपनों को आयाम दे रहा है।
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ब्रुश और रंग से उकेरे हालात
जिले के कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय में आयोजित पोस्टर प्रतियोगिता में बेटियों ने अपने सपनों को उकेरा। प्रदेश स्तर पर होने वाली इस प्रतियोगिता में सभी बॉ स्कूल में छात्राओं को कुछ टॉपिक दिए गए थे, जैसे मेरा हक, मेरा सपना, मेरा स्कूल और मेरे आदर्श। इन टॉपिक पर बिजुआ केे बॉ स्कूल की तरन्नुम निशां, उज्मा, सरिता, दिव्या, पूजा, कल्पना, पूनम, ममता समेत लगभग 12 छात्राओं ने पोस्टर बनाकर अपने ख्वाबों को कोरे कागज पर उकेरा। बिजुआ की उज्मा की पढ़ाई छूृट चुकी थी, घर पर भाई पढ़ने के लिए जाता था, उज्मा घर के चौका बरतन करने के दौरान चुपचाप अपने भाई को स्कूल जाते देखती थी, बॉ स्कूल ने एक बार फिर से मौका दिया, तो उज्मा यहां आ गई, पोस्टर प्रतियोगिता में उज्मा ने मिले टॉपिक पर अपने हक को पोस्टर पर उकेरतेे हुए घर के उसी सीन को हूबहू उतार दिया। यही कल्पना ने भी किया जिस स्कूल को दोबारा जाने का वह ख्वाब देखती थी, पोस्टर में उसी स्कूल की इमारत अपने ख्वाबों की ताबीर दिखा दी। तरन्नुम, सरिता समेत सभी ने पोस्टर पर रंग नही अपने ख्वाब भरे।
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वर्जन
ये पोस्टर जिले पर जाएंगे, जहां पर सभी स्कूलों से 20 सर्वोत्तम पोस्टरों को परियोजना कार्यालय लखनऊ भेजा जाएगा। वहां से चयनित पोस्टर को डिजिटलाइजेशन करके छात्राओं के नाम समेत पूरे प्रदेश के बॉ स्कूलों में भेज दिया जाएगा।
-अनुराग कुमार मिश्रा, खंड शिक्षा अधिकारी।

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