घाघरा ने खुशहाल किसानों को बना दिया मजदूर

Lakhimpur Updated Sat, 04 Aug 2012 12:00 PM IST
ईसानगर-सिसैया रोड पर डेरा डाल रहने को हैं मजबूर
पुनर्वास के लिए प्रशासन को नही मिल रही जमीन
ईसानगर-खीरी। कल तक खुशहाल जिंदगी गुजारने वाले किसान आज दूसरे के खेतों पर मजदूरी कर अपनी जीविका चलाने को मजबूर है। इन दिनों वे न सिर्फ मजदूर हैं बल्कि मजबूर भी हैं। आज से पांच वर्ष पहले घाघरा नदी ने इनकी जमीनों के साथ इनके घर भी उजाड़ दिए। इन विस्थापितों केपुनर्वास की सुध अभी तक किसानों ने नहीं ली है। पलिया के विस्थापितों को दर्द और आश्वासन के लॉलीपाप के सिवा कुछ नहीं मिला।
ग्राम पंचायत पलिया के करीब 200 परिवार ईसानगर-सिसैया मार्ग के किनारे झोपड़ी डालकर रह रहे हैं, इस सड़क से अधिकारियों और नेताओं के काफिले भी गुजरते हैं लेकिन इनका दर्द जानने की किसी ने कोशिश नहीं की। इनके दुर्दिनों की शुरूआत वर्ष 2006 से हुई। घाघरा नदी के विनाशकारी कटान ने इनका घर-जमीन सब कुछ छीन लिया। वर्ष 2007 आते आते पूरा गांव नदी के पेट में समा गया। तब से प्रशासन इनके पुनर्वास की जुबानी कोशिश कर रहा है।
गांव वालों का दुर्भाग्य कहें या प्रशासनिक नाकामी इनको आज तक बसने की जगह नहीं मिल सकी। पलिया गांव के पूर्व प्रधान रामखेलावन बताते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में तहसील से लेकर जिले तक चक्कर लगाए लेकिन बात नहीं बनी, वर्तमान प्रधान राजेश वर्मा का कहना है कि पीड़ित परिवारों को पुुुुुर्नस्थापित कराने के लिए उन्होंने पूर्व एसडीएम से वार्ता की थी लेकिन उन्होंने जमीन न मिल पाने की बात कह कर टाल दिया।
पीड़ित रज्जू, बाबू, सिपाही, मैकू, रामखेलावन, लाला, गिरधारी, बेवा कुन्नी, बब्बूलाल, धनीराम, परसराम, रामासरे, लवकुश, कंधैया लाल, शंकर, हनीफ, छोटकन्नू, बिल्कीस जहां, इसराईल, उमर व यूसुफ आदि के मुताबिक नेता से लेकर अधिकारियों तक मिन्नतें करने के बाद भी बसने के लिए जगह नहीं दी गई है। इससे दोबारा उजड़ने का खतरा भी बना हुआ है।

इंसेट.....
नदी के बाद अब सड़क विभाग का डर
विकास की डोर में क्षेत्र को पिरोने की कवायद में भारत सरकार के भूतल एवं सड़क परिवहन मंत्रालय द्वारा ईसानगर मार्ग का चौड़ीकरण एवं उच्चीकरण का काम शुरू किया है। इससे रोड के किनारे बसे इन लोगों के झोपड़े सड़क की जद में आ गये हैं। अब यह लोग काफी भयभीत हैं कि उन्हें दोबारा न उजड़ना पड़े।

इंसेट.....
पुनर्वास के लिए जगह की तलाश जारी
जो गांव कट चुके हैं उनको दोबारा बसाने के लिए करीब के गांवों में सरकारी जगह तलाश की जा रही है। निजी जमीन खरीद का अभी तक कोई प्रस्ताव नहीं बना है, अगर सरकारी जमीन नहीं मिलती है तब निजी जमीन खोजी जाएगी लेकिन निजी जमीन खरीदने के लिए जमीन के मालिक की सहमति आवश्यक है, तभी शासन को प्रस्ताव भेजा जाएगा।

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