तराई में फैला पशु तस्करों का नेटवर्क

Lakhimpur Updated Tue, 31 Jul 2012 12:00 PM IST
भारी तादात में दुधारू पशुओं की ‘बाहर’ सप्लाई
दूध की किल्लत का कारण बन सकती है पशु तस्करी
लखीमपुर खीरी। तराई में पशु तस्करों ने मजबूत नेटवर्क बना लिया है। जिले के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद नेटवर्क के सदस्य सुनियोजित तरीके से पशुओं को एक जगह एकत्र कर ट्रक-डीसीएम आदि लोडरों से बाहर के जिलों में सप्लाई कर रहे हैं। इससे दुधारू पशुओं की तादात कम हो रही है। वहीं दूध के उत्पादन में गिरावट आई है। पुलिस ने कुछ मामलों में गाड़ियों को पकड़कर पशुओं को बरामद करने में सफलता जरूर हासिल की है, लेकिन नेटवर्क को भेद पाने में नाकाम रही है। लिहाजा गांव-गांव तक पैठ बना चुके पशु तस्करों को बेनकाब करना पुलिस के लिए चुनौती बनी हुई है।
पशुओं की तस्करी का सिलसिला सालों पुराना है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बढ़ती मांस की डिमांड ने इसके अवैध कारोबार का ग्राफ बड़े पैमाने पर पहुंचा दिया है। विदेशों में मांस की बढ़ती मांग के मद्देनजर निर्यातकों की नजर गांवों में जम गई है, क्योंकि शहरी क्षेत्र में पशुओं की तादात पहले से ही काफी कम है। ऐसे में गांव ही मजबूत विकल्प के तौर पर नजर आया है। सूत्र बताते हैं कि बरेली, मेरठ, संभल, रामपुर व मुरादाबाद आदि जगहों पर स्लाटर हाउस स्थापित किए गए हैं, जहां से पैक्ड मांस की सप्लाई विदेशों में की जाती है। अन्य राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश प्राकृतिक संसाधनों के मामले में समृद्ध बना हुआ है, जिसके चलते पशुओं की तादात अच्छी है। खासकर तराई के जिलों में पशु-पालन के अनुकूल माहौल है। लिहाजा मांस के कारोबारियों ने तराई के जिलों लखीमपुर, बहराइच, श्रावस्ती, पीलीभीत, सीतापुर में अपना नेटवर्क फैला लिया है। इस नेटवर्क के सदस्य गांवों में किसानों को रुपयों का लालच देकर फंसाते हैं। गांव-गांव से पशुओं को खरीदने के बाद उन्हें एक स्थान पर एकत्र कर गाड़ियों से बाहर भेज दिया जाता है।

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प्रतिबंधित पशुओं की तादात ज्यादा
पिछले एक सप्ताह में पुलिस ने आधा दर्जन से अधिक मामले पशु तस्करी के पकड़े हैं, जिससे बड़े पैमाने पर हो रहे कारोबार की पुष्टि हो गई है। खास बात यह है कि ज्यादातर मामलों में प्रतिबंधित पशु ही बरामद किए गए। इसके पीछे जो कारण निकलकर सामने आया है वह बेहद चौंकाने वाला है। सूत्र बताते हैं कि महिवंशीय पशुओं की कीमत गोवंशीय पशुओं से कई गुना अधिक है। तो दूसरा कारण यह है कि गोवंशीय पशुओं में बीमारी का प्रकोप कम ही होता है, जबकि महिवंशीय पशुओं के बीमार होने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं। इनके मरने के मामले भी ज्यादा होते हैं।

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नहीं पकड़े जाते व्यापारी
पशु तस्करी के कई मामले पुलिस ने पकड़े, लेकिन असल व्यापारी उसकी पकड़ में नहीं आते। अधिकांश मामलों में चालक तक ही पुलिस के हाथ सिमट जाते हैं, तो कुछ मामलों में गाड़ी व उसमें ठूसकर भरे पशु ही हाथ लगते हैं।

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दुग्ध उत्पादन पर प्रतिकूल असर
पशुओं की तस्करी कई मायनों में नुकसानदेह है। सबसे ज्यादा प्रतिकूल असर दुग्ध उत्पादन पर पड़ता है। पिछले साल की अपेक्षा इस वर्ष दुग्ध उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है, क्योंकि इसका ग्राफ बढ़ने के बजाय स्थिर हो गया है।
अमरचंद, उप दुग्धशाला विकास अधिकारी

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तस्करी के मामलों पर पूर्ण रूप से पाबंदी लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं। पिछले दो महीने में सैकड़ों पशुओं को मुक्त कराया जा चुका है। इस जिले में फैले नेटवर्क के सदस्यों को चिन्हित किया जा रहा है। सब कुछ ठीक-ठाक रहा, तो इसके जल्द ही परिणाम सामने आएंगे।
राजेंद्र सिंह, पुलिस अधीक्षक, लखीमपुर खीरी

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