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लोकतंत्र के दरवाजे पर एक और दस्तक

Lakhimpur Updated Mon, 02 Jul 2012 12:00 PM IST
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वोट डालने की हर ठोंक जगाती रहीं लोकतंत्र को
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पूछा गया आखिर कौन हो शहर का पहला नागरिक
लखीमपुर खीरी। शहर का पहला नागरिक कौन हो? इसे पूछने के लिए लोकतंत्र के दरवाजे पर एक और दस्तक हो गई है। बहुत शोर हुआ। गली मोहल्ले से मतदान स्थल तक जो खींचतान मची रही, उसे देख लगता था कि लोकतंत्र ने अलसाए नैना खोल दिए हैं। कोई और कुछ न पूछ बैठे इससे पहले ही उसने सवाल खड़ा कर दिया। क्या अच्छी तरह सोच समझकर वोट डाला?
बाजार, गली मोहल्ले सब शांत थे। सुनाई दे रही थी तो केवल वोट डालने में ठोंकी जा रही मोहर की ठक-ठक, ठक-ठक। मोहल्ला और उनकी गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ था। बाजारों में दुकानों के शटर गिरे हुए थे। कहीं-कहीं मोहल्लों और मतदान केंद्रों से इतर कुछ दुकानें खुलीं थीं जो आम लोगों को खोजने पर ही मिल सकतीं थीं। बीड़ी, सिगरेट और पान तंबाकू वाले तलबियों की खोजी नजरें ही इन तक पहुंच सकीं। बाहरी लोग और नौकरीपेशा तो सुबह चाय-नाश्ता तक को तरस गए।
अलसाए लोकतंत्र को जगाने का मौका था। सो सभी ने बर्दास्त किया। उम्मीदवारों को उम्मीद थी कि लोकतंत्र जागेगा और उसके अपने पक्ष में जाएगा। इसके लिए सबके संयुक्त प्रयास लगे थे। यही कारण था कि सुबह सूरज निकला बाद में उम्मीदवारों के एजेंट पहले से मोहल्लों में मौजूद दिखे। किसी दरवाजे के खुलने की आहट सुनी, तो लपककर पहुंच गए, खींसे निपोरीं...बोले- अरे सुरेश जी, घर में सब उठ गए क्या? चलिए कितनी देर लगेगी। सुरेश जी ने इस निरीह प्राणी प्रत्याशी के एजेंट के चेहरे की नकल करने की कोशिश की और उन्हीं की तरह तीन कोने के मुंह बनाते हुए बोले-आप बेफि क्र रहिए। हमारे घरे के सभी छह मतदाता आपको ही वोट देंगे। प्लीज, लेकिन हमसे थोड़ी दूरी बनाएं रखें। हम दूसरे प्रत्याशी से संबंध खराब नहीं रखना चाहते हैं। इसी तरह आशीष, नयनाभिराम, सत्यप्रकाश, जफरउद्दीन, संतोष सिंह और रामसेवक के दरवाजे खुले तो विभिन्न उम्मीदवारों के कई आकार प्रकार के चमचे खड़े मिले। कुछ ने तो उनकी पूछताछ का जवाब दिए बगैर ही दरवाजे बंद कर लिए तो कुछ ने इन लोगों को किसी न किसी हुनर के जरिए टरकाया।
शाम तक वोट डालने वाली मोहर की ठक -ठक होती रही। इस आवाज को लोकतंत्र के दरवाजे पर दस्तक माना जाता रहा। मतदान केंद्रों के अलावा शहर के प्रमुख स्थान भी रविवार को सन्नाटे में दिखे। लेकिन, इसके विपरीत कई मतदान केंद्रों पर तो परवी जैसा माहौल रहा। शहर के पहले नागरिक के चुनाव के दिन लोकतंत्र ने अलसाई आंखें खोलीं और संतोष की सांस ली। कोई ऐसी बड़ी घटना नहीं हुई जो लोकतंत्र को परेशान करती।

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