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तराई में लुट रहा प्रकृति का खजाना

Lakhimpur Updated Tue, 05 Jun 2012 12:00 PM IST
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विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष
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जहरीली हो रही हवा और नदियों का पानी भी
प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुध दोहन से पर्यावरण असंतुलन बढ़ा
लखीमपुर खीरी। तेजी से हो रहे जंगलों के सफाए से तराई की हरियाली उजड़ रही है। औद्योगिक कचरे और शहर के कूड़ा-करकट से नदियों का पानी जहरीला हो रहा है। जनरेटर और वाहनों का धुआं हवा को विषैला बना रहा है। प्राकृतिक संपदा से मालामाल इस जिले की हरियाली को जैसे ग्रहण लग गया है। इसे बचाने के प्रति न हम सचेत हैं न संबधित विभाग। जो प्रयास हो भी रहे हैं वे केवल हवा-हवाई हैं, और जागरूकता अभियानों तक ही सीमित हैं।
पर्यावरणविदों का मानना है कि मौसम में आ रहे बदलाव का कारण पर्यावरण का असंतुलन है। पिछले कुछ वर्षों से एकाएक गर्मी बढ़ी है, जाड़े और बरसात में कमी आई है। पर्यावरण प्रदूषण के चलते लोगों में बीमारियां बढ़ी हैं तो फसलों में रोग। इसके चलते किसानों को कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करना पड़ रहा है। कीटनाशकों के ज्यादा प्रयोग से चिड़ियों और भूमि में रहने वाले जीव और जीवाणु नष्ट हो रहे हैं। पक्षियों के लिए मोबाइल टावरों की तरंगें भी काफी घातक साबित हो रही हैं। पर्यावरण असंतुलन के भयावह परिणाम सामने हैं लेकिन हम अब भी चेतने का नाम नहीं ले रहे हैं।
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कटान की दर से नहीं हो रहा पौधरोपण
जिन विभागों पर जंगल और हरियाली बचाने की जिम्मेदारी है। उन्हीं की शह और साठ-गांठ से पेड़ों का कटान हो रहा है। जितने पेड़ों के परमिट बनते हैं उससे कई गुना ज्यादा पेड़ों को काट दिया जाता है। परमिट जारी करते समय यह भी नहीं देखा जाता कि पेड़ सूखे हैं या हरे। परमिट जारी करते समय परमिट लेने वाले व्यक्ति को कम से कम उतने ही पौधे लगाने की हिदायत दी जाती है। इसके लिए वन विभाग में प्रतिभूति भी जमा कराई जाती है, लेकिन काटे गए पेड़ों के बदले नए पेड़ लग ही नहीं रहे हैं। इससे हरियाली उजड़ती जा रही है।
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कचरा बना रहा नदियों का पानी जहरीला
शहर और गांवों की लाइफ लाइन कही जाने वाली नदियों में औद्योगिक और शहरी कचरा डाले जाने से उनका पानी जहरीला होता जा रहा है। शहर के निकट बहने वाली नदियों का पानी पीने से कई बार मवेशियों की मौत भी हो चुकी हैं। मछलियां मरने की घटनाएं तो आए दिन होती रहती हैं। नदियों का पानी विषैला होने से जलीय जीवों का संतुलन भी बिगड़ता जा रहा है।
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शहर की फिजा में धुएं का जहर
शहर से सटे क्षेत्रों में लगी औद्योगिक इकाइयों की चिमनियों से निकलता धुआं और बिजली न रहने पर शहर में चलते हजारों की संख्या में जनरेटर इतना धुंआ उगलते हैं कि लोगों को सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा सड़कों पर फर्राटा भरते वाहन भी बड़ी मात्रा में धुआं छोड़ रहे है। वायु प्रदूषण से लोगों को अस्थमा, टीबी और दूसरी सांस संबंधी बीमारियां हो रही हैं। 000000
ध्वनि प्रदूषण से बहरे हो रहे लोग
वाहनों में लगे प्रेशर हार्न, प्रचार के लिए शहर में चलते कानफोड़ू लाउडस्पीकर, शादी विवाह और अन्य मांगलिक समारोहों में तेज आवाज के साथ डीजे, साउंड सिस्टम, तेज धमाके वाले पटाखों लोगों को सुनने की समस्या होने लगी है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि ध्वनि प्रदूषण का यही हाल रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में आधे से ज्यादा लोग बहरे हो जाएंगे।
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ओजोन छतरी भी प्रभावित, बढ़ रही गर्मी
पर्यावरण असंतुलन का सबसे बड़ा कारण बढ़ती जनसंख्या और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन है। इसके चलते वायुमंडल में जीवनदायनी आक्सीजन की कमी होती जा रही है। वायुमंडल में 20 प्रतिशत कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा बढ़ चुकी है। एसी और फ्रिज में इस्तेमाल होने वाली क्लोरो फ्लोरो कार्बन गैस के उत्सर्जन से ओजोन पर्त को भारी क्षति पहुंच रही है। इससे ओजोन पर्त के ऊपर की हानिकारक किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ रही हैं। यही कारण है कि इतनी अधिक गर्मी पड़ रही है।
-डॉ. सुनील त्रिपाठी, पर्यावरणविद, प्रवक्ता वनस्पति विज्ञान, वाईडी कालेज, लखीमपुर
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पर्यावरण असंतुलन से बढ़ रही बीमारियां
पर्यावरण असुंतलन के चलते लोग तरह-तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। वायु प्रदूषण से लोगों में अस्थमा और अन्य सांस संबंधी बीमारियां हो रहीं हैं। जबकि ध्वनि प्रदूषण के चलते लोगों में बहरापन आता जा रहा है। जल प्रदूषण से लोगों में त्वचा रोग और पेट संबंधी बीमारियां हो रहीं हैं।
-डॉ. वीके श्रीवास्तव, रिटायर्ड जिला क्षय रोग अधिकारी, लखीमपुर

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