खीरी में ‘एम’ व ‘ईको’ ने पेश की नजीर

Lakhimpur Updated Mon, 28 May 2012 12:00 PM IST
मनरेगा की तर्ज पर ‘काम के बदले पैसा कार्यक्रम’
रोजगार पाने में महिलाओं की 68 फीसदी भागीदारी
भोजन, कपड़े, दवा, शिक्षा व फसलों की सिंचाई पर किया खर्च
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अमित गुप्ता
लखीमपुर खीरी। सरकार व उनकी योजनाएं भले ही ग्रामीणों को एकजुट नहीं कर पा रही हैं, लेकिन जिले में सक्रिय स्वयं सेवी संगठन ने ग्रामीणाें को एकजुट किया है। दैवीय आपदा से निपटने के लिए सक्षम बनाने की दिशा में सराहनीय पहल करते हुए एक नजीर पेश की है। बाढ़ व कटान के चलते निर्धनता का शिकार हुए लोगों को रोजगार मुहैया कराने में मदद करने के साथ ही उनमें जज्बा व जोश भरने के सफल प्रयास किए हैं। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में सीमित संसाधनों के सहारे उनके घरों को डूबने से बचाने के प्रयास के साथ ही सुरक्षित पेयजल के इंतजाम किए थे। अब मनरेगा की तर्ज पर स्वयं सेवी संगठन ने काम के बदले पैसा कार्यक्रम चलाकर रोजगार मुहैया कराया है।
खीरी जिला जैव विविधता से परिपूर्ण होने के साथ ही दैवीय आपदाओं से घिरा है। इंडो-नेपाल सीमा के चलते जिले की चार तहसीलें पलिया, निघासन, धौरहरा व लखीमपुर बारिश के सीजन में बाढ़ व कटान की त्रासदी झेलती हैं, जिससे हजारों परिवार बेघर होने के साथ निर्धनता का शिकार हो जाते हैं। राहत के नाम पर सरकारी मशीनरी हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती है, लेकिन इससे इनका कुछ भला नहीं हो सका है। इनके पुनर्वास को लेकर कोई ठोस प्रयास सरकार ने नहीं किए हैं। ऐसे में कुछ सामाजिक संगठन बाढ़ पीड़ितों के लिए एक उम्मीद की किरण साबित हो रहे हैं। साथ ही सरकार व उनके नुमाइंदों के लिए एक मिसाल भी कायम करते हुए रोल माडल भी पेश कर रहे हैं। सीमित संसाधनों के सहारे यह संगठन बहुत बड़ा बदलाव करने में सक्षम तो नहीं, लेकिन लोगों को एक मंच पर लाने में कामयाब जरूर हुआ है।

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बाढ़ पीड़ितों को काम के बदले मिला पैसा
बाढ़ पीड़ितों की जरूरतों को ध्यान में रखकर संगठन एम, ईको व एक्सनएड ने संयुक्त रुप से मनरेगा की तर्ज पर ‘काम के बदले पैसा कार्यक्रम’ चलाया। एम के कार्यकारी निदेशक विनोद सिंह बताते हैं कि 21,397 मानव कार्य दिवसों का सृजन किया गया, जिसमें 14,527 दिवस महिलाओं ने काम किया। शेष 6,870 दिवस पुरुषों ने काम किया। इसके एवज में 25,67,640 रुपये का भुगतान किया गया। इस कार्यक्रम के तहत कार्य करने वाले श्रमिकों को जाब कार्ड भी जारी किया गया, जिस पर प्रतिदिन इंट्री की गई। भारत सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के हिसाब से भुगतान किया गया।

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फूलबेहड़ और नकहा में मिला काम
बाढ़ प्रभावित क्षेत्र फूलबेहड़ ब्लाक के गांव मानपुर करदहिया, गूम, पिपरा गूम, गौरा व मैनहा में कार्यक्रम चलाया गया। वहीं नकहा ब्लाक के गांव सकेथू, बेल्हौरा, पकरिया, बंजरिया में बाढ़ पीड़ितों को इस कार्यक्रम से रोजगार मिला। श्रमिकों ने सार्वजनिक कार्य, कच्ची सड़क, अस्पताल व स्कूलों की सफाई करने के साथ ही गांव की गलियों में मिट्टी डालकर बाढ़ में डूबने से बचाने के लिए ऊंचा किया। इसके अलावा अति निर्धनों के घरों की मरम्मत भी कराई गई।

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भोजन, शिक्षा पर पैसे का उपयोग
काम के बदले पैसा कार्यक्रम से मिली धनराशि का प्रयोग भोजन, शिक्षा, बच्चों के कपड़े, दवा और फसलों की सिंचाई पर किया गया। सूत्रों की माने तो बाढ़ प्रभावित इलाके में मनरेगा से लोगों को रोजगार मुहैया नहीं हो पा रहा है।

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मनरेगा की शर्तों का हुआ पालन: विनोद
एम के कार्यकारी निदेशक विनोद सिंह ने कार्यक्रम के बारे में बताया कि यूरोपियन देशों के मानवतावादी संगठन ईको व एक्सनएड की मदद से कार्यक्रम संचालित किया गया। मनरेगा की शर्तों को फालो करते हुए महिला श्रमिकों के बच्चों को कार्य के दौरान भोजन भी मुहैया कराया गया। दैवीय आपदा ग्रस्त इलाकों में ऐसे कार्यक्रम लोगों को एकजुट होकर आपदा से निपटने में मदद करते हैं।

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