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कैसे बुझे जानवरों की प्यास, सूख गए तालाब

Lakhimpur Updated Wed, 02 May 2012 12:00 PM IST
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जंगल में पानी न होने से वन जीवों के लिए खतरा बढ़ा
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लखीमपुर खीरी। सूखे तालाब और नदियां प्यासे जानवरों को मुंह चिढ़ाते नजर आ रहे हैं। चिलचिलाती धूप से अधिकतर तालाब सूख गए हैं। नदियों का जलस्तर बेहद कम हो गया है। यहां तक कि मनरेगा के तहत खोदे गए आदर्श तालाब भी सूखे पड़े हैं। अभी तक किसी भी पंचायत ने तालाबों को भरवाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है।
गर्मी अभी पूरे शबाब पर नहीं आई है लेकिन कड़ी धूप के चलते अधिकतर तालाब और पोखर सूख गए हैं। मवेशियों को पीने का पानी इन्हीं तालाब पोखरों से मिलता है। इनके सूखने से जानवर प्यास से बिलबिला रहे हैं। आदर्श तालाब योजना के तहत गांवों में खोदे गए तालाब भी सूख चुके हैं।

शासन के निर्देश हैं कि गर्मियों में तालाबों का पानी सूख जाने पर उन्हें ट्यूबवेल के जरिए भरवाया जाए, लेकिन अब तक न तो ऐसा किया गया है और न ही प्रशासन स्तर से ऐसे कोई आदेश ही जारी किए गए हैं। पुराने समय में जानवरों के लिए बनावाए जाने वाले प्याऊ की प्रथा ही खत्म हो गई है ऐसे में जानवरों के लिए पानी का संकट पैदा हो गया है।
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खत्म होते जा रहे हैं तालाब
जिले में राजस्व रिकार्ड के मुताबिक करीब 5500 तालाब पोखर और झीलें थीं। इनमें से अब बमुश्किल 2500 तालाब ही रह गए हैं। बाकी या तो पट चुके हैं या अतिक्रमण का शिकार हो चुके हैं। तालाबों के खत्म होने से मवेशियों के लिए पानी का संकट तो पैदा हुआ ही है, वाटर रिचार्ज सिस्टम और गांवों में जल निकास की समस्या भी पैदा हुई है। यही कारण है कि अब गांवों मे भी जलभराव की समस्या पैदा होने लगी है।
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जंगली जानवरों के लिए भी पानी की किल्लत
जंगलों के तालाब-पोखर सूख चुके हैं। दुधवा की लाइफ लाइन कही जाने वाली सुहेली नदी भी जलहीन हो गई है। जंगली जानवर अपनी प्यास बुझाने के लिए आबादी क्षेत्र में आ रहे हैं। जंगल से निकलने पर इनके शिकार का खतरा बढ़ गया है। हाल ही में जंगल से निकले कई हिरन शिकारियों के हत्थे चढ़ गए। कुछ को आवारा कुत्तों ने नोच कर घायल कर दिया।
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यदि संकट बढ़ा तो भरवाए जाएंगे तालाब
उधर प्रशासनिक सूत्रों ने बताया कि सूखे की स्थिति में तालाबों में पानी भरवाने के आदेश हैं, लेकिन अभी ऐसी स्थिति नहीं है। यदि पानी का संकट बढ़ा तो पंचायतों के माध्यम से तालाबों में पानी भरवाया जाएगा। आदर्श तालाब योजना में खोदे गए तालाबों में पानी बना रहे इसकी जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों की है।

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