बिहार में एक फरवरी से लागू होगा खाद्य सुरक्षा बिल: नीतीश

Kushinagar Updated Wed, 27 Nov 2013 05:41 AM IST
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कुशीनगर। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार को कहा कि खाद्य सुरक्षा बिल पहली फरवरी से प्रदेश में लागू कर दिया जाएगा। आने वाले वर्षों में बिहार की जनता को बिजली के लिए तरसना नहीं पड़ेगा क्योंकि वर्ष 2015 तक बिहार के सभी गांवों में बिजली लग जाएगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर कभी वोट मांगने नहीं आऊंगा। वह कुशीनगर जिले से बिहार प्रांत को जोड़ने के लिए बड़ी गंडक पर बने धनहां-रतवल पुल का लोकार्पण करने आए थे।
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खराब मौसम की वजह से थोड़ा विलंब से पहुंचे बिहार के सीएम ने कहा कि गौतम बुद्ध से जुड़ा कुशीनगर काफी रमणीय स्थल है। बिहार के लौरिया में भी अशोक स्तंभ है। दोनों स्थानों को जोड़ने वाले इस पुल का नाम गौतम बुद्ध सेतु रखा जाएगा क्योंकि महात्मा बुद्ध इसी रास्ते गए थे। 358.67 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित 1848 मीटर लंबे इस पुल से दोनों प्रांतों के लोगों की आवागमन संबंधी परेशानियां दूर हो जाएंगी। उनके इस उद्बोधन पर सभा तालियों से गूंज उठी। खड्डा और दुदही प्रतिनिधि के अनुसार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि जब से बिहार में जदयू की सरकार बनी है, अपराध में कमी आ गई। अपराधी सरकार के सामने घुटने टेक दिए हैं। पहले विद्यालयों में बच्चियां नहीं दिखती थीं लेकिन शिक्षा की देन है कि अब इनकी संख्या बढ़ गई है। आने वाले समय में बड़ी गंडक पर पुलों का जाल बिछ जाएगा। चीनी मिलों को चलवाने के साथ-साथ किसानों को उनके गन्ने का उचित मूल्य दिया जाएगा। इस अवसर पर धनहा के विधायक राजेश सिंह, सांसद बैजनाथ प्रसाद, विधायक विनय बिहारी, प्रमुख मन्नु सिंह चंदेल सहित कई लोग मौजूद थे।
कहीं यह संप्रग के करीब आने के संकेत तो नहीं
कुशीनगर। बड़ी गंडक पर बने धनहां-रतवल पुल का लोकार्पण करने आए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जोरदार स्वागत हुआ। भीड़ को देख उत्साहित नीतीश भी लोक सभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए घोषणाएं करने से नहीं चूके। उन्होंने पहली फरवरी से बिहार में खाद्य सुरक्षा बिल लागू करने की घोषणा की। इसे लेकर यह कयास लगाया जा रहा है कि लोक सभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए वह केंद्र की संप्रग सरकार के करीब आने के संकेत दिए हैं। वहीं पुल का नामकरण महात्मा बुद्ध सेतु करने की घोषणा करके उन्होंने न केवल बौद्ध अनुयायियों को खुश किया है बल्कि दलित मतदाताओं को भी लुभाने की पूरी कोशिश की है।
मुख्यमंत्री मंगलवार को दिन के 01:55 बजे धनहां में बने अस्थायी हेलीपैड पर हेलीकाप्टर से उतरे। उन्हें गार्ड आफ ऑनर दिया गया। कड़ी सुरक्षा के बीच वे पुल पर पहुंचे, जहां उन्हाेंने सेतु का लोकार्पण किया। उत्तर प्रदेश में जिस खाद्य सुरक्षा बिल के विरोध में प्रदेश सरकार अड़ी हुई है, उसे पहली फरवरी से बिहार में लागू करने की घोषणा करके मुख्यमंत्री ने सबको चौंका दिया। 30 मिनट के अपने संबोधन में उन्हाेंने धनहां-रतवल पुल का नाम गौतम बुद्ध सेतु रखे जाने की घोषणा की। इसके पीछे उनका तर्क तो यह था कि कुशीनगर जहां महात्मा बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली है, वहीं लौरिया में अशोक स्तंभ है। दोनों बौद्ध स्थलों के लिए आवागमन सुगम हो जाएगा और दोनों प्रांतों के लोग एक-दूसरे से जुड़ेंगे। लेकिन इसे बौद्ध अनुयायियों और दलित वोटरों को लुभाने का प्रयास कहा जा रहा है। उनकी तीसरी घोषणा 2015 तक बिहार के सभी गांवों में विद्युतीकरण को लेकर थी। उनका दावा कि यदि इस दरमियान विद्युतीकरण पूरा न हुआ तो वे कभी वोट मांगने नहीं आएंगे, इसे भी लोक सभा चुनाव को लेकर सियासी दांव समझा जा रहा है। हालांकि, वाल्मीकिनगर के विधायक राजेश सिंह ने धनहां-रतवल पुल के लोकार्पण के दौरान इसके नामकरण के संकेत पहले ही दे दिए थे। पिछले हफ्ते पडरौना नगर में आए विधायक ने कहा था कि पुल का नाम गौतम बुद्ध सेतु रखा जा सकता है। उन्हाेंने कहा कि इस पुल को बनवाने का सपना चुनाव में आने के पहले से था, जो आज साकार हुआ है।
58 महीने में तैयार हो गया दूसरा बड़ा पुल
खड्डा। बिहार के धनहां पुल से आवागमन शुरू हो जाने के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को काफी फायदा होने वाला है। बिहार के पश्चिमी चंपारण और यूपी के कुशीनगर को जोड़ने वाले इस पुल का निर्माण पूरा होने के बाद दोनों प्रांतों में व्यापारिक और धार्मिक वजहों से आवागमन सुलभ हो जाएगा।
अपने प्रथम कार्यकाल के दौरान बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 20 जनवरी 2009 को इस पुल का शिलान्यास किया था। 43 ख्ंाभों पर बने इस पुल की कुल लंबाई 1848 मीटर है। इस पुल के निर्माण का जिम्मा बिहार पुल निर्माण नामक संस्था को दिया गया था। 358.67 करोड़ की लागत से बनने वाले इस पुल का निर्माण कार्य 58 महीनों मेें पूरा किया गया है। पुल के उस पार रतवल तक की दूरी 7.75 किलोमीटर और इस पार धनहां की तक की दूरी 8.48 किलोमीटर है। इसी दूरी को तय करने के लिए पहले लोगों को 125 किलोमीटर से अधिक की यात्रा करनी पड़ती थी। पुल को बनान के लिए जमीन के लिए किसानों को मुआवजा देने के एवज में सरकार को एक करोड़ 21 लाख 20 हजार 711 रुपये खर्च करने पडे़। यह बिहार के गांधी सेतु के बाद दूसरा बड़ा पुल होगा।
इस पुल के निर्माण के बाद बिहार के पश्चिमी चंपारण जनपद के बगहां अनुमंडल के भीतहां, मधुबनी, ठकरहां, पिपरासी चार प्रखंड गंडक नदी के इस पार उत्तर प्रदेश की सीमा की तरफ पड़ते हैं। पश्चिमी चंपारण के जिला मुख्यालय बेतियां, मुजफ्फरपुर, पटना आदि जगहों पर जाने के लिए या तो जान जोखिम में डालकर नाव से लंबी दूरी तय कर जाना पड़ता था, या फिर पनियहंवा पुल के रास्ते जंगल पार कर जाना पड़ता था। ऐसी यात्रा से धन और समय दोनों की बर्बादी होती थी। इस पुल से आवागमन शुरू होने के बाद दोनो की बचत होगी। लोगों का कहना है कि इस पुल के निर्माण के बाद केवल सड़क ही नहीं, दोनो प्रांतों के दिल भी जुड़ेंगे। एक दूसरे प्रांतों में शादी-ब्याह सहित अन्य धार्मिक सांस्कृतिक पारिवारिक प्रायोजनों को बल मिलेगा। पुल से बौद्ध धर्म के लोगों को बिहार के लौरिया स्थित अशोक स्तंभ और नंदनगढ़ स्तूप जाने का रास्ता आसान हो जाएगा तो वहीं बिहार के लोागों को कुशीनगर की दूरी कम लगने लगेगी। वहीं इस पुल के निर्माण के बाद दोनों प्रांतो के बीच व्यापारिक रिश्ते को भी मजबूती मिलेगी। इस पुल के उद्घाटन के बाद दोनो प्रांतों के लोगों के बीच सामाजिक ताने-बाने को मजबूती मिलेगी।
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