किसानों ने घोषित गन्ना मूल्य को धोखा बताया

Kushinagar Updated Fri, 22 Nov 2013 05:40 AM IST
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पडरौना। किसानों की चिंता कम करने के लिए बुधवार को गन्ना मूल्य घोषित कर दिया गया। जिस गन्ना मूल्य की घोषणा न होने के कारण किसान चिंतित थे, उसकी घोषणा के बाद चिंता और बढ़ गई है। किसान इस गन्ना मूल्य को नाकाफी बता ही रहे हैं। सपा को छोड़कर अन्य राजनैतिक दलों के लोग इसे किसानों के साथ धोखा बता रहे हैं। कई दलों ने इसके लिए आंदोलन करने की चेतावनी भी दी है।
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बहुप्रतीक्षित गन्ना मूल्य की घोषणा बुधवार को हो गई। सरकार ने इस वर्ष के गन्ना मूल्य में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की है। पिछले वर्ष के गन्ना मूल्य ही किसानों को दिए जाएंगे। चीनी मिलों को दो रुपये क्विंटल गन्ना कर में छूट भी सरकार ने दी है। गन्ना मूल्य की घोषणा होते ही जिले का तापमान बढ़ गया है। विधायक विजय कुमार दुबे का कहना है कि किसान हित की सरकार को पोल खुल गई है। गन्ना मूल्य को यथावत रखने से किसानों की कमर टूट जाएगी। ऐसे में किसान गन्ने की खेती को बंद कर सकता है। गन्ना मूल्य बढ़ाने के लिए आंदोलन किया जाएगा। वहीं तमकुहीराज के विधायक अजय कुमार लल्लू का कहना है कि सरकार चीनी मिलों के साथ मिली हुई है और किसानों के हितों के बजाय उसने चीनी मिल का हित देखा है। भाजपा नेता और पूर्व विधायक मदन गोविंद राव ने तो प्रदेश की सरकार को किसान विरोधी बताते हुए गन्ना मूल्य बढ़ाए जाने के लिए आंदोलन की चेतावनी दे दी है। उनका कहना है कि इस दर पर किसानों को एक भी रुपये का फायदा नहीं होने वाला है। उन्होंने सरकार और चीनी मिलों की सांठ-गांठ का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार ने किसानों के पीठ में छूरा घोंपा है। पूर्व विधायक नंदकिशोर मिश्र ने कहा कि किसानों की हितैषी बनने का ढोंग करने वाली सपा सरकार की पोल खुल गई है। गन्ना मूल्य की घोषणा ने इस सरकार का असली चेहरा सामने ला दिया है। आसमान छूती महंगाई के दौर में पिछले साल का गन्ना मूल्य निर्धारित करना किसानों के साथ विश्वासघात है। उन्होेंने कहा कि शीघ्र ही पार्टी इस मुद्दे पर आंदोलन करेगी। हियुवा के जिला प्रभारी अजय गोविंद राव शिशु ने कहा कि इस सरकार के पास सभी को देने के लिए रुपये हैं, केवल किसानों के लिए रुपये नहीं है। पिछले सीजन में गेहूं की खरीद के नाम पर किसानों को छला गया। सरकार के पास कब्रिस्तान को बाउंड्री कराने के लिए और अन्य योजनाओं को चलाने के लिए रुपये हैं। सरकार ने लैपटॉप बांटा है, उसका हश्र किसी से छिपा नहीं है। किसानों को देने के लिए सरकार के पास कुछ भी नहीं है।
तमकुहीरोड प्रतिनिधि के अनुसार राजपुर के किसान श्रीकांत मिश्र कहते हैं कि यह कितने हैरत की बात है कि जब गन्ना मूल्य निर्धारण समिति ने गन्ना मूल्य में 23 फीसदी बढ़ोत्तरी की सिफारिश की थी, तब भी सरकार चीनी मिलों के दबाव में आ गई। अहिरौलीदान के किसान जितेंद्र सिंह का कहना है कि गन्ने का मूल्य यथावत रखना किसानों के साथ धोेखा है। जबकि सपा के जिला उपाध्यक्ष जयंत सिंह का कहना है कि गन्ना किसानों और चीनी उद्योग को बचाने के लिए सरकार का निर्णय स्वागत योग्य है।
गन्ने की खेती यानी घाटे का सौदा
पडरौना। पूरे देश का एक तिहाई गन्ना पैदा करने वाले सूबे के लिए गन्ने का रेट घोषित हो गया है। पिछले वर्ष का ही रेट घोषित किए जाने से किसानों में असंतोष पैदा हो गया है। किसानों का कहना है कि बढ़ती महंगाई के दौर में गन्ना मूल्य में बढ़ोत्तरी नहीं किए जाने से गन्ने की खेती उनके लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है। इससे तो गन्ना किसानों की कमर टूट जाएगी और ऐसा न हो कि किसान गन्ने की खेती से विमुख हो जाए। किसानों के अनुसार एक एकड़ गन्ने की खेती कर गन्ने को चीनी मिलों तक पहुंचाने में 45 से 50 हजार रुपये का खर्च आ रहा है।
गन्ना किसानों को अच्छी पैदावार पाने के लिए गन्ने की फसल में इस्तेमाल किए जाने वाले कीटनाशक, उर्वरक, डीजल और सूक्ष्म तत्वों के साथ कृषियंत्रों के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके सापेक्ष गन्ना मूल्य में बढ़ोत्तरी न होने से हजारों छोटे किसान गन्ने की खेती छोड़ सकते हैं। इसके पीछे कारण है कि एक वर्ष की फसल गन्ने का दाम कब मिलेगा, इसकी कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है। चालू पेराई सत्र के लिए प्रदेश सरकार ने गन्ना मूल्य में एक भी रुपये की बढ़ोत्तरी नहीं की है। पिछले वर्ष का गन्ना मूल्य अगैती किस्म के गन्ने का 290 रुपये, सामान्य प्रजाति के गन्ने का 280 रुपये और अस्वीकृत प्रजाति के गन्ने का मूल्य 275 रुपये प्रति क्ंिवटल मिलेगा। गन्ना किसान बच्चा सिंह बताते हैं कि इस वर्ष गन्ना तैयार कर चीनी मिलों तक पहुंचाने में किसानों की लागत पिछले वर्ष की अपेक्षा 20 से 25 फीसदी बढ़ गई है। उनके अनुसार गन्ना बीज को छोड़कर उर्वरक, कीटनाशक, डीजल, मजदूरी तथा गन्ना ढुलाई भाड़े में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। इससे गन्ने की लागत तो बढ़ गई है लेकिन गन्ने का दाम न बढ़ाए जाने से किसानों के लिए इसकी खेती घाटे का सौदा हो गई है। इस दर से गन्ना बेचने पर किसानों की पूरे साल की मजदूरी तक नहीं निकलेगी। उन्होंने बताया कि एक एकड़ गन्ने को चीनी मिल तक पहुंचाने में लगभग 45 हजार रुपये की लागत लग जा रही है। अडरौना के किसान राजन गोेविंद राव का कहना है कि गन्ना ऐसी फसल है जिसमें सबसे अधिक बीज लगता है। पूरे वर्ष की फसल होने के नाते पूरे साल किसान कुछ न कुछ कार्य खेतों में करता रहता है। इनके अनुसार खुद कार्य नहीं करने वाले किसान का एक एकड़ गन्ने को चीनी मिल तक पहुंचाने में लगभग 48 हजार रुपये तक की लागत आ रही है। उसके बाद भी यह निश्चित नहीं है कि उस गन्ने का दाम कब मिलेगा। विशुनपुरा के किसान रामवृक्ष यादव बताते हैं कि उन्हाेंने इस वर्ष गन्ने की खेती काफी मन से किया और फसल अच्छी हो, इसलिए जरूरत है कि सभी चीजों को गन्ने वाले खेत में डाला। पांच बार सिंचाई की। तीन बार दवा का छिड़काव कराया। गन्ने की फसल लहलहा रही है। इनके अनुसार एक एकड़ गन्ने में बीज से लेकर चीनी मिल तक पहुंचाने में 45 से 50 हजार रुपये के बीच खर्च आता है। इनकी औसत उपज लगभग 225 क्विंटल प्रति एकड़ है। इनका भी कहना है कि सरकार ने जो गन्ना रेट निर्धारित किया है, उस हिसाब से तो पूरे साल की मजदूरी भी नहीं निकल पाएगी। एक एकड़ गन्ने का यदि समय से दाम मिल जाए तो भी किसानों को कुछ नहीं बचेगा। ऐसे तो गन्ने की खेती बंद करनी होगी। गन्ना किसान और केनयूनियन के उपाध्यक्ष शांतीश शाही ने कहा कि एक एकड़ गन्ना बोने में खेत को तैयार करने में 5000 रुपये तक का खर्च आ रहा है। एक एकड़ खेत को बोते समय और बाद में डाली जाने वाले कुल खाद, जिसमें दो बोरी डीएपी 2410 रुपये, चार बोरी यूरिया 1233 रुपये, 50 किलोग्राम पोटास 850 रुपये के अलावा अन्य उर्वरकों का कुल खर्च लगभग 2000 से 2500 रुपये तक का आ रहा है। इसके अलावा एक एकड़ गन्ने की बुआई करने के लिए 1500 रुपये का लेबर, गुड़ाई करने में तीन बार मिलाकर कम से कम 4000 रुपये का खर्च आ रहा है। इसके अलावा चार बार सिंचाई करने में यदि किसान दूसरे के पंपिंग सेट से सिंचाई कराता है तो 65000 हजार रुपये का खर्च पड़ रहा है। गन्ने पर मिट्टी चढ़ाई और गन्ने की बंधाई पर भी लगभग 3000 रुपये का खर्च आता है। गन्ना तैयार करने में ही किसान को इतनी रकम खर्च करनी होगी। इसके बाद गन्ने की छिलाई और उसको वाहन पर लादकर उसे चीनी मिल तक पहुंचाने में एक एकड़ गन्ने का खर्च 14 से 15 हजार रुपये लग जाता है। इन सभी को मिलाकर एक एकड़ गन्ने को बोने, तैयार करने और चीनी मिल तक पहुंचाने में किसान का 45 से 50 हजार रुपये तक का न्यूनतम खर्च आता है। इसके अलावा अभी कीटनाशक का इस्तेमाल के हिसाब से खर्च अलग है। जिले में गन्ने की औसतन उपज 220 क्विंटल प्रति एकड़ है। इस हिसाब से किसान को एक एकड़ गन्ना चीनी मिल को बेचने के बाद उसे 10 से 12 हजार रुपये का लाभ मिलेगा। इस हिसाब से किसान परिवार के एक सदस्य की पूरे साल की मजदूरी तक नहीं मिल पा रही है।
गोरखपुर गन्ना अनुसंधान केंद्र पर भी एक क्विंटल गन्ना तैयार करने में 250 रुपये से 260 रुपये तक का खर्च आ रहा है। जबकि इस केंद्र पर गन्ना बेचने के लिए न तो छिलाई करानी पड़ती है और न ही गन्ने की ढुलाई में ही कोई खर्च होता है। सेवरही गन्ना अनुसंधान केंद्र के डॉ. बिरेश सिंह के अनुसार एक क्विंटल गन्ना तैयार करने में उनके केंद्र पर 251 रुपये का खर्च आया है। इस केेेंद्र से भी किसानों को गन्ने का बीज सप्लाई होता है। यहां भी गन्ने की छिलाई और ढुलाई के मद में कोई खर्च नहीं है।
बीस वर्षों से नहीं बढ़ा जिले में गन्ना का क्षेत्रफल
पडरौना। सरकार और चीनी मिलों के लाख प्रयासों के बाद भी जिले में गन्ना क्षेत्रफल नहीं बढ़ाया जा सका है। इसके पीछे जो कारण बताया जा रहा है, वह है गन्ने की खेती का लाभकारी न होना, गन्ना मूल्य का समय से भुगतान न होना और बढ़ती आबादी।
गोरखपुर गन्ना शोध संस्थान के सहायक निदेशक ओमप्रकाश गुप्ता बताते हैं कि वर्ष 1991-92 में कुशीनगर जिले के 90 हजार हेक्टेयर भूमि पर गन्ने की खेती की गई थी। 21 वर्षों के बाद वर्ष भी जनपद के कुल 86 हजार हेक्टेयर की भूमि पर ही गन्ने की खेती की गई है। उन्होंने बताया कि गन्ना पूरे एक वर्ष की फसल है। बढ़ती महंगाई के कारण गन्ने की खेती की लागत भी बढ़ गई है। गन्ने की खेती करने से किसान को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। दूसरी बात यह है कि गन्ना बेचने के बाद मूल्य भुगतान की कोई समय सीमा नहीं है। इसी कारण जिले में किसानों का गन्ने की खेती की तरफ झुकाव नहीं बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि बढ़ती आबादी के कारण किसान पहले अपने परिवार के लिए राशन की व्यवस्था करता है। उसके बाद ही गन्ने की खेती के बारे में सोचता है।
कैसे होगी खेती, सरकारी सुविधा का कर्ज जमा नहीं
पडरौना। पिछले वर्ष का बकाया गन्ना मूल्य अब तक नहीं मिला। किसानों को सरकारी सुविधा के नाम पर किसान क्रेेडिट कार्ड से लोन दिए जाने की व्यवस्था है। गन्ना मूल्य भुगतान न होने से पुराना बकाया जमा नहीं हो पाया है। अब बैंक नया ऋण देगा नहीं।
किसानों को खेती करने के लिए सराकर ने बैंकों से फसली ऋण और किसान क्रेडिट कार्ड की व्यवस्था दी है। पिछले वर्ष किसानों ने बैंक से ऋण लेकर खेती की। गन्ना मूल्य का भुगतान न होने के कारण किसान बैंकों को पिछले ऋण का भुगतान नहीं कर पाया है। बैंक नए ऋण तभी देंगे, जब पिछले ऋण का भुगतान हो गया हो। अब किसानों के सामने एक समस्या और आ गई है कि पिछला ऋण न जमा करने के कारण उन्हें बैंक नया ऋण नहीं दे रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में किसान खेती कैसे करेगा।
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