एएनएम और आशा को निलंबित करने का आदेश

Kushinagar Updated Thu, 24 Oct 2013 05:39 AM IST
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पडरौना। जंगल विशुनपुरा के गोसाईपट्टी की मुसहर बस्ती के तीन बच्चों की इंसेफेलाइटिस से मौत की खबर मिलने पर डीएम भी बुधवार को गांव में पहुंचे। पीड़ित परिवारों से मिलकर उन्हाेंने अपनी सहानुभूति जताई। उन्होंने इस बीमारी के फैलने की वजह स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की लापरवाही को मानते हुए गांव की एएनएम और आशा को निलंबित करने का आदेश दिया है जबकि सीएमओ, प्रभारी चिकित्साधिकारी, ग्राम प्रधान और पंचायत सेक्रेटरी को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
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डीएम रिग्जियान सैंफिल बुधवार को दोपहर बाद इस गांव में पहुंचे। उन्होंने बीमारी से मरने वाले बच्चों के परिवारीजनों से मिलकर ढांढस बंधाया और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई करने का भरोसा दिलाया। गांव से लौटने पर डीएम ने बताया कि पूरे प्रकरण में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से इंकार नहीं किया जा सकता है। आखिर तीन बच्चों की मौत और कई के पीड़ित होने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग क्या करता रहा? उन्होंने बताया कि लापरवाही के आरोप में गांव की एएनएम और आशा को निलंबित कर दिया गया है। सीएमओ, प्रभारी चिकित्साधिकारी, ग्राम प्रधान और पंचायत सेक्रेटरी को शोकाज नोटिस दिया गया है। उन्होंने बताया कि गांववालों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए जलनिगम को गांव में तीन इंडिया मार्क टू हैंडपंप लगवाने और देसी हैंडपंपों को उखाड़ने का आदेश दिया गया है।
इंसेफेलाइटिस से बालक की मौत
कसया। पकवाइनार डुमरी के परसौनी टोला निवासी छोटेलाल राजभर के पुत्र मोहित की इंसेफेलाइटिस से मौत हो गई। बालक कई दिनों से बीमार था। उसका कसया के एक निजी चिकित्सालय में इलाज चल रहा था। मंगलवार को परिवार के लोग बेहतर इलाज के लिए गोरखपुर ले गए। बुधवार की सुबह उसकी मौत हो गई। बालक प्राथमिक विद्यालय कुशीनगर में कक्षा दो का छात्र था। बालक की मौत की सूचना मिलते ही स्कूल बंद कर दिया गया। प्रधानाचार्य राजीवनयन द्विवेदी, अनीता, राजीव, अर्जुन चौरसिया समेत सभी छात्रों ने शोक जताया।
बच्चों की सलामती के लिए पहुंचाया
दुदही। जंगल विशुनपुरा के गोसाईपट्टी दलित बस्ती के रहने वाले लोगों की मानी जाए तो जिस बीमारी को लेकर वे दहशतजदा हैं, उसके सभी लक्षण इंसेफेलाइटिस से मिलते-जुलते हैं। उनके बच्चे इस बीमारी से बचे रहें, इसके लिए उन्हें रिश्तेदारियों में भेज दिया है।
अपने जिगर के टुकड़े को खो चुके इस गांव के सुरेश पटेल बताते हैं कि उसे पहले बुखार आया, फिर जबड़े बैठ गए, शरीर में अकड़न होने लगी। उसे एंबुलेंस से लेकर दुदही सीएचसी पर पहुंचा, जहां उसे ड्रिप चढ़ाई गई। इसके बाद जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया।
गांव के मोतीलाल बताते हैं कि एक-एक करके बच्चों के बीमार होने से उन्हें कई तरह की आशंकाएं सता रही हैं। घर के तीनों बच्चे सलामत रहें, इसके लिए उन्हें अपनी ससुराल पहुंचा दिया है।
आशा देवी कहती हैं कि अपने तीन बच्चों को बंगालीपट्टी गांव के लमकन स्थित अपने मायके पहुंचा आई हैं। इनका कहना था कि बच्चों को बीमार होते देखकर हिम्मत नहीं होती कि अपने बच्चों को यहां रखें।
गांव के अनोखेलाल, रमेश, राधा प्रसाद सहित कई लोगों ने कहा कि बीमारी पूरे गांव में फैलती जा रही है। सुबाष, रामनगीना, भरत, रमेश, शरधा, जवाहिर, घरभरन आदि ने भी बताया कि वे अपने बच्चों को गांव से बाहर भेज दिए हैं ताकि वे सही-सलामत रहें।
तीन बच्चों के मरने पर टूटी स्वास्थ्य विभाग की तंद्रा
दुदही। जिस बच्चे के जन्म पर सुरेश खुशी से फूले नहीं समाए थे, नौ साल बाद उसी का शव उन्हें अपने हाथों से दफन करना पड़ा। बुखार से उसके तपते बदन, अकड़ते शरीर और खून की उल्टी करते देख उनका कलेजा फट जाता था। उस मंजर को याद करके सुरेश अब भी सिहर उठते हैं। ऐसी ही हालत गोसाईपट्टी के मोती और सुभाष की भी है, जो अपने बच्चों की मौत पर आज आंसू बहा रहे हैं।
इंसेफेलाइटिस की रोक-थाम को लेकर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य महकमा की ओर से आएदिन बैठकें की जा रही हैं। सफाई से लेकर शुद्ध पेयजल के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। लापरवाही मिलने पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए जा रहे हैं। इस बीमारी के प्रति जागरूकता के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार करने के बावजूद अंकुश नहीं लग पा रहा है। वजह यह है कि प्रभारी चिकित्साधिकारी, एएनएम और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारी अपने दायित्वों का पूरी तरह निर्वहन नहीं कर रहे हैं। इस लापरवाही का नतीजा जंगल विशुनपुरा के गोसाईपट्टी में भी देखने को मिल रहा है। इस गांव की दलित बस्ती में जेई/एईएस का प्रकोप पांच दिनों से फैला है। इलाज के लिए बच्चों को दुदही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया फिर भी स्वास्थ्य विभाग की कोई टीम गांव में नहीं पहुंची। नतीजा यह हुआ कि इंसेफेलाइटिस से एक-एक करके गांव के तीन बच्चों की मौत हो गई और कई इस बीमारी से अब भी जूझ रहे हैं। मंगलवार को जब अखबारनवीसाें ने इस बारे में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से बात की, तब जाकर स्वास्थ्य विभाग की नींद खुली। न सिर्फ रातों-रात गांव में सफाई कर दी गई बल्कि अगले दिन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की टीम भी पहुंच गई।

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