बांसी मेले की तैयारियां पूरी

Kushinagar Updated Wed, 28 Nov 2012 12:00 PM IST
मंसाछापर। ‘सौ काशी न एक बांसी’ की कहावत को चरितार्थ करने वाले कार्तिक पूर्णिमा के प्रसिद्ध स्नान और मेले के लिए तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। प्रशासन ने नदी के घाटों की सफाई कराने के साथ खिरकिया से बांसी तक सड़क की सफाई के लिए मंगलवार को सफाईकर्मी लगाए थे। झूले वालों ने झूला लगा लिया था।
पडरौना से आठ किलोमीटर दूर बांसी धाम विशुनपुरा ब्लाक के सिंगापट्टी ग्राम पंचायत में पड़ता है। घाटों की साफ-सफाई ग्राम पंचायत ने ही कराई है। मंगलवार को भी ग्राम प्रधान प्रतिनिधि भीम सिंह घाटों की साफ-सफाई करा रहे थे। उन्होंने बताया कि शाम होने से पहले पूरी व्यवस्था दुरुस्त हो जाएगी। खिरकिया मार्ग से बांसी धाम तक के रास्ते की सफाई के लिए धौरहरा और बबुइया हरपुर न्याय पंचायत के सफाईकर्मी भी लगाए गए हैं।
बांसी घाट के अलावा रामघाट और बैरिया घाट की भी सफाई कराई गई। इन घाटों पर भी श्रद्धालु स्नान-दान करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन बांसी नदी के बारे में मान्यता है कि सौ बार काशी के गंगा नदी में स्नान करने से जितना पुण्य नहीं मिलता है, उतना एक बार बांसी नदी में स्नान करने से मिलता है। बुधवार को कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर भोर के चार बजे से ही श्रद्धालु स्नान करने के लिए नदी में डुबकी लगाने लगेंगे। क्षेत्रीय लोगों के मुताबिक कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर बांसी नदी में स्नान करने के लिए बनारस, बिहार, गोरखपुर, महराजगंज, देवरिया, बस्ती, सिद्धार्थनगर सहित दूर-दूर से लोग आते हैं। स्नान करने के बाद दान-दक्षिणा देते हैं और पूजा करने के बाद मेले में खरीददारी करते हैं। मेले में दुकानें, झूले, फर्नीचर, पूजा की सामग्रियां तथा अन्य सामानों की दुकानें लग गई हैं। मंगलवार को दोपहर में एसडीएम सदर एसएन शुक्ला और सीओ जेपी सिंह ने बांसी घाटाें का निरीक्षण किया। मेले में स्वास्थ्य विभाग की टीम भी लगाई गई है। बांसी घाट पर जाने के लिए मंगलवार की शाम से ही मार्ग पर श्रद्धालुओं की भीड़ दिखने लगी थी।
हो चुका है घाटों का बंटवारा
- बांसी घाट पर स्नान के बाद पंडितों की मांग बढ़ जाती है। गो दान करने के बाद पंडित को उनकी डिमांड के मुताबिक दक्षिणा देनी पड़ती है। इसके लिए पंडित लोग घाटों का बंटवारा भी कर चुके हैं।
- बांसी स्नान के बाद मेला समाप्त नहीं हो जाता। मेला एक सप्ताह तक चलता है, जहां लोग सामानों की खरीददारी करते हैं।
- बांसी धाम के मेले का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने अपनी ससुराल मिथिला (जनकपुर) से लौटकर अयोध्या जाते समय माता सीता के साथ बांसी नदी के तट पर विश्राम किया था। उन्होंने बांसी नदी में स्नान भी किया था। कहा जाता है कि इस नदी में स्नान करने के बाद गरीबों को दान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- बांसी नदी के घाट पर जहां पानी गहरा है, वहां सुरक्षा के लिए बांस के बैरियर लगाए गए हैं, ताकि लोगों को कोई परेशानी न आए।
- आस्था का यह केंद्र दिनों-दिन अतिक्रमण का शिकार होता जा रहा है। यदि स्थानीय प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं देता है तो नदी पर खतरा बढ़ सकता है।

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